सुप्रीम कोर्ट नें महिलाओं के लिए खोले सबरीमाला मंदिर के द्वार, जानिए क्या कहते हैं हमारे वेद और शास्त्र

सुप्रीम कोर्ट नें महिलाओं के लिए खोले सबरीमाला मंदिर के द्वार, जानिए क्या कहते हैं हमारे वेद और शास्त्र

Tanvi Sharma | Publish: Sep, 28 2018 01:35:12 PM (IST) | Updated: Sep, 28 2018 03:52:53 PM (IST) तीर्थ यात्रा

सुप्रीम कोर्ट नें महिलाओं के लिए खोले सबरीमाला मंदिर के द्वार, जानिए क्या कहते हैं हमारे वेद और शास्त्र

केरल के सबरीमाला मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दे दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा की अब मंदिर में हर उम्र व की महिलाएं मंदिर में प्रवेश कर दर्शन कर सकती हैं। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस खानविल्कर ने कहा, अयप्पा के भक्तों में कोई भेदभाव नहीं होगा। सबरीमाला मंदिर में इससे पहले 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को एंट्री नहीं थी। इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने कोर्ट में इस प्रथा को चुनौती दी थी। पांच जजों की संविधान पीठ में 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया गया।

1500 साल पुरानी परंपरा

केरल के प्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 उम्र तक की महिलाओं के प्रवेश करने पर पाबंदी थी। पहाड़ियों पर बने इस मंदिर में हर साल लाखों श्रद्धालु भगवान अयप्पा के दर्शन करने आते हैं, लेकिन दर्शनार्थियों में पुरुष ही होते हैं। यदि मंदिर में महिलाएं आती थी तो वे 10 साल की उम्र से छोटी बच्चियों और 50 साल से बड़ी औरतों को वहां आने की अनुमति थी। ऐसा इसलिए क्योंकि सबरीमाला मंदिर भगवान अयप्पा का मंदिर है। भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी और तपस्वी माना जाता है। इसलिए मंदिर में मासिक धर्म के आयु वर्ग में आने वाली स्त्रियों का जाना प्रतिबंधित है। मंदिर ट्रस्ट का दावा है कि यहां 1500 साल से महिलाओं के प्रवेश पर बैन है।

sabrimala case

आइए वेदों के अनुसार जानें महिलाओं के प्रवेश पर रोक के बारे में

ऋग्वेद में मिलता है उल्लेख

वैदिक काल में कन्याओं को शुभ तथा विशेष शक्ति से युक्त माना जाता था। इसकी पुष्टि उजस् को दिव की पुत्री निर्देशित करने से होती है। ऋग्वेद में पुत्र एवं पुत्री के दीर्घायु कामना का भी उल्लेख आता है। ऋग्वेद में प्रभूत संख्या में वाणों को धारण करने वाले त्रषुधि की प्रशंसा ‘अनेक पुत्रियों के पिता’ कहकर की गई है। अन्यत्र पुत्र को पिता के सत्कार्यों का कर्त्ता और पुत्री को आदर करने योग्य कहा गया है। कौषीतकि ब्राह्मण में एक कुमारी गंधर्व गृहीत अग्निहोत्र में पारंगत बतायी गयी है। बालिकाओं के लिए बालकों की ही भांति शिक्षा ग्रहण करना आवश्यक थी। बालिकाएं ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई विविध विद्याओं में पारंगत होती थी। आध्यात्मिक ज्ञान के क्षेत्र में बृहस्पति भगिनी, भुवना, अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला, मैना, धारिणी, संमति आदि कन्याओं का उल्लेख आता है। ये सभी ब्रह्मवादिनी थी। ऐसी कन्याओं का भी उल्लेख आता है जिन्होंने तपस्या के बल पर अभीष्ट वर की प्राप्ति की, यथा उमा, धर्मव्रता आदि। यही नहीं गृह में निवास करती हुई कन्याएं भी गृहस्थ शिक्षा से अवगत हुआ करती थी। वहां क‌िसी प्रकार का भेद-भाव नहीं किया जाता था तो जब हर क्षेत्र में स्‍त्री-पुरुष की समानता की बात कर रहे हैं, तो ईश्वर के दरबार में भेद-भाव भी उचित नहीं।

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