केंद्रीय विश्वविद्यालयों के खाली पद दशकों से भरे नहीं गए हैं। वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अप्रैल, 2017 में विश्वविद्यालयों में नियुक्ति के लिए यूनिवर्सिटी के बदले विभागवार नियुक्ति को मानने का फैसला किया था। इस फैसले का दलित और पिछड़े वर्गों ने विरोध किया था जबकि सरकार ने भी माना था कि अगर इस फैसले को लागू किया जाता है तो अगले 100 सालों में भी आरक्षित वर्ग के लोगोंं में से कोई विश्वविद्यालयो में कोई प्रोफेसर नहीं बन पाएगा। इस फैसले के बाद से एससी, एसटी, ओबीसी के खाली पदों का बैकलॉग और बढ़ गया। पिछले दो साल से ज्यादा समय से विश्वविद्यालयों में नियुक्ति प्रक्रिया ठप पड़ी है। सरकार ने कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए 7 मार्च 2019 को अध्यादेश लार्ई थी।