
नई दिल्ली। झारखंड में इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर '65 पार' का नारा बुलंद करने वाली भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के कई दिग्गज नेताओं के पार्टी में शामिल होने से उत्साहित थी। लेकिन गुरुवार को दो राज्यों खासकर हरियाणा और बिहार में हुए उपचुनाव के नतीजों ने भाजपा रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है।
भाजपा के नेताओं की मानें तो पार्टी ने एक रणनीति के तहत विपक्षियों का मनोबल तोड़ने के लिए विपक्षी दलों के ऐसे नेताओं को तोड़ने की योजना बनाई थी, जो अपनी पार्टी के नेतृत्व से नाराज थे। भाजपा की यह रणनीति कामयाब भी रही। कांग्रेस और झामुमो में सेंध लगाते हुए सुखदेव भगत, मनोज यादव, कुणाल षाडंगी, ज़े पी़ पटेल और भानु प्रताप शाही जैसे विधायकों को भाजपा में शामिल भी कर लिया गया। इनके शमिल होने के बाद भाजपा खेमे का उत्साह और बढ़ा।
इस साल हुए लोकसभा चुनाव परिणाम से उत्साहित भाजपा अन्य दलों के दिग्गजों के आने के बाद खुद को जहां मजबूत मान रही थी। वहीं विपक्ष भी मायूस दिख रही थी। इस बीच, गुरुवार के चुनाव परिणामों ने विपक्षी दलों को संजीवनी दे दी है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रामेश्वर उरांव का कहना है, 'हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार उपचुनाव के नतीजा ने एक बार फिर भाजपा के खोखले विकास के दावों की हवा निकाल दी है। अब भाजपा का बड़बोलापन समाप्त हो जाएगा।'
उन्होंने कहा कि भाजपा के बड़े नेता महाराष्ट्र में 200 और हरियाणा में 75 के पार का दावा कर रहे थे, लेकिन दो प्रदेशों के मतदाताओं ने भाजपा की आकांक्षाओं के अनुरूप बहुमत नहीं दिया। दोनों प्रदेशों के चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी रहे और झारखंड में भी '65 पार' का नारा खोखला साबित होगा।
Updated on:
25 Oct 2019 09:47 am
Published on:
25 Oct 2019 09:43 am
