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पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने छेड़ा हिंदुत्व का मुद्दा, बोले- ‘हिंदुत्व जीने का तरीका’ फैसला दोषयुक्त

सुप्रीम कोर्ट के दिवंगत जज, जस्टिस जे.एस. वर्मा के फैसले 'हिंदुत्व जीने का तरीका' को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बताया 'दोषयुक्त'।
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नई दिल्ली

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Dheeraj Sharma

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Updated: 26 Sep 2018, 9:05 AM IST

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पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने छेड़ा हिंदुत्व का मुद्दा, बोले- 'हिंदुत्व जीने का तरीका' हो रहा गलत इस्तेमाल

नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनमोहन सिंह ने हिंदुत्व के मुद्दे को एक बार हवा दे दी है। सुप्रीम कोर्ट के दिवंगत जज, जस्टिस जे.एस. वर्मा की ओर से 1990 के दशक में दिए गए फैसले 'हिंदुत्व जीने का तरीका' को दोषयुक्त बताते हुए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंगलवार को कहा कि एक संस्थान के रूप में न्यायपालिका को, संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना की हिफाजत करने के प्राथमिक कर्तव्य की अपनी दृष्टि नहीं खोनी चाहिए।

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राजनीतिक विवादों और चुनावी लड़ाइयों में दुरुपयोग
पूर्व प्रधानमंत्री ने दिवंगत कम्युनिस्ट नेता ए.बी. बर्धन स्मृति व्याख्यान में इस बात पर जोर दिया कि यह काम पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है, क्योंकि राजनीतिक विवादों और चुनावी लड़ाइयों को धार्मिक रंगों, प्रतीकों, मित्थकों और पूर्वाग्रहों के साथ व्यापक रूप से घालमेल किया जा रहा है।

संवैधानिक पवित्रता को नुकसान पहुंचाने वाला फैसला
पूर्व प्रधानमंत्री ने यह कहते हुए न्यायमूर्ति वर्मा के फैसले की आलोचना की कि इसने एक तरह से एक प्रकार की संवैधानिक पवित्रता को नुकसान पहुंचाया, जो देश की राजनीतिक बातचीत में बोम्मई फैसले के जरिए बहाल हुई थी, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय पीठ ने यह व्यवस्था दी थी कि धर्मनिरपेक्षता, संविधान का एक बुनियादी ढांचा है।

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मनमोहन ने कहा कि जस्टिस वर्मा के फैसले का गणराज्य में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों और प्रथाओं के बारे में राजनीतिक दलों के बीच जारी बहस पर एक निर्णायक असर डाला है। सिंह ने कहा, इस फैसले ने हमारी राजनीतिक बातचीत को कुछ असंतुलित कर दिया, और कई लोग मानते हैं कि निस्संदेह इस फैसले को पलटने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की सजगता और बौद्धिक क्षमताओं के बावजूद कोई भी संवैधानिक व्यवस्था सिर्फ न्यायपालिका द्वारा संरक्षित नहीं की जा सकती है. अंतिम तौर पर संविधान और इसकी धर्मनिरपेक्ष प्रतिबद्धताओं के संरक्षण की जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व, नागरिक समाज, धार्मिक नेताओं और प्रबुद्ध वर्ग की है।