त्रिशंकु संसद की नौबत आने पर ये सियासी क्षत्रप बन सकते हैं किंगमेकर!

त्रिशंकु संसद की नौबत आने पर ये सियासी क्षत्रप बन सकते हैं किंगमेकर!

Dhirendra Kumar Mishra | Publish: May, 18 2019 07:11:00 AM (IST) | Updated: May, 18 2019 12:02:21 PM (IST) राजनीति

  • नई सरकार को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं
  • त्रिशंकु संसद की सभांवना से नहीं कर सकते इनकार
  • सियासी क्षत्रप एक बार फिर सरकार के गठन में निभा सकते हैं अहम भूमिका

नई दिल्ली। दो महीने से ज्यादा समय से जारी लोकसभा चुनाव का सियासी संग्राम अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है। 19 मई को अंतिम चरण का मतदान होने के बाद 23 मई को चुनाव परिणाम आने का अभी से इंतजार है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार बनाने को लेकर अभी से जोड़तोड़ जारी है। हालां‍कि सरकार गठन को लेकर अभी तक स्पष्ट स्थिति उभरकर सामने नहीं आई है। सवाल यह है कि मोदी सत्ता में वापसी करेंगे या यूपीए-3 की सरकार बनेगी। एक संभावना ये भी है कि त्रिशंकु संसद की स्थिति सियासी पटल पर उभरकर सामने न आ जाए। अगर ऐसा होता है तो कुछ सियासी क्षत्रप किंगमेकर की भूमिका में होंगे। आइए हम आपको बताते हैं कि ऐसी स्थिति में संभावित किंगमेकर कौन होंगे और कौन किसको समर्थन दे सकता है।

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एनडीए को समर्थन करने वाले दल
अगर भाजपा बहुमत के आंकड़े से दूर रहती है तो उसे सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों की जरूरत पड़ेगी। इस बात की आशंका पहले सुब्रमण्यम स्वामी, राम माधव और शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत जता चुके हैं। भाजपा इस बार चुनावी जंग जीतने के लिए 40 से अधिक दलों के साथ मिलकर चुनाव मैदान मेें है। एनडीए गठबंधन यूपी में अपना दल, बिहार में जेडीयू-एलजेपी, महाराष्ट्र में शिवसेना, पंजाब में अकाली दल, तमिलनाडु में एआईएडीएमके सहित सात दल और पूर्वोत्तर में एजीपी, एनपीपी, डीपीपी, एनपीपी व अन्य दल शामिल हैं। बहुमत हासिल न होने पर जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर, तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर की पार्टी टीआरएस, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की पार्टी बीजेडी भाजपा का समर्थन कर सकती हैं। वाईएसआर, टीआरएस और बीजेडी तीनों केे अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस मुख्य प्रतिद्वंद्वी की भूमिका में है। भाजपा की नजर महाराष्ट्र में शरद पवार की एनसीपी, वाजपेयी को समर्थन देने वाले जम्मू-कश्मीर की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस, बिहार में उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी, जीतनराम मांझी की हिन्दुस्तान अवामी मोर्चा, मुकेश साहनी की वीआईपी पार्टी, हरियाणा में ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी इनेलो को अपने साथ लाने की है।

शुक्रवार को अंतिम चरण का प्रचार समाप्‍त होने के बाद दिल्‍ली में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस के दौरान भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह ने पार्टी को 300 से ज्‍यादा सीटें मिलने संभावना जताई है। लेकिन पूर्ण बहुमत न मिलने की स्थिति में छोटे दलों से गठबंधन के लिए अपना दरवाजा खुला रखा है।

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यूपीए को समर्थन देने वाली पार्टियां
दरअसल, इस बार चुनावी समीकरण पूरी तरह से बदलेे हुए हैं। भाजपा के खिलाफ एक तरफ अलग-अलग राज्यों में विपक्षी दलों का मजबूत गठबंधन है तो दूसरी तरफ कांग्रेस की सियासी जमीन 2014 से मजबूत नजर आ रही है। ऐसे में जरूरत पड़ने पर कांग्रेस को तमिलनाडु से डीएमके, वामपंथी पार्टियां, कर्नाटक सेे जेडीएस, पश्चिम बंगाल से टीएमसी, यूपी में सपा और बसपा, जम्मू और कश्मीर से एनसी और पीडीपी जैसी सियासी पार्टियां अपने रुख के हिसाब से समर्थन देने की घोषणा कर सकती हैं। आंध्र से टीडीपी, आरएलएसपी, हम, आरजेडी का समर्थन कांग्रेस को मिलने की उम्‍मीद है। इसके अलावा सरकार बनाने के करीब होने की स्थिति में पूर्वोत्तर राज्यों की पार्टियों और जेएमएम आदि का समर्थन भी मिल सकता है।

दूसरी तरफ कांग्रेस ने खुद की संभावना तलाशने के लिए अपने अनुभवी व वरिष्‍ठ नेता एवं पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ. प्रणव मुखर्जी को टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी, वाईएसआर प्रमुख जगन मोहन रेड्डी व अन्‍य क्षेत्रीय दलों के नेताओं को मनाने की जिम्‍मेदारी सौंपी है। अशोक गहलोत उनसे मिलकर इस बात की संभावना तलाशने का अनुरोध कर चुके हैं।

विपक्षी एका के सामने बड़ी समस्या यह है कि बड़े सियासी क्षत्रप जैसे बसपा-सपा और टीएमसी खुद के नेतृत्‍व में कांग्रेस पर सरकार बनाने का दबाव डाल सकती हैं। यूपी में सपा-बसपा-रालोद ने चुनावी गठबंधन से कांग्रेस की राह में कई मुश्किलें पहले ही खड़ी हैंं। वहींं टीएमसी ने लोकसभा चुनाव के दौरान जिस तरह से भाजपा के सामने चुनौती पेशकर सबसे मजबूत दाबेदारी पेश की है वो चौंकाने वाली है। ऐसे में मोदी सरकार को रोकने के लिए कांग्रेस कर्नाटक की तरह टीएमसी या बसपा में से किसी एक को बाहर से या सशर्त समर्थन देकर सरकार बना सकती है। ऐसा संभव इसलिए कि है कि विपक्षी दलों का जोर मोदी की सत्ता में वापसी करने से रोकना है। ऐसे में कांग्रेस को भी समझौतावादी रवैया अपनाना होगा। ऐसी स्थिति में टीएमसी और बसपा में से कौन सी पार्टी सरकार का नेतृत्‍व करने की स्थिति में होगी ये अभी स्पष्ट नहीं है।

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किंगमेकर की भूमिका को लेकर इन सियासी क्षत्रपों पर है सबकी नजर

 

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1. ममता बनर्जी

ताकत : ममता बनर्जी 15 साल की उम्र से ही राजनीतिक जीवन में हैं। ममता केंद्र में दो बार रेल मंत्री रह चुकी हैं। उन्हें देश की पहली महिला रेल मंत्री बनने का गौरव प्राप्त है। 2011 से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री पद पर कार्यरत हैं। वह तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख भी हैं। लोग उन्हें प्यार से दीदी (बड़ी बहन) के नाम से संबोधित करते हैं। केंद्र सरकार में रेल मंत्री के अलावा कोयला, मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री, युवा मामलों और खेल के साथ ही महिला व बाल विकास की राज्य मंत्री रह चुकी हैं। 2011 में उन्होंने पश्चिम बंगाल में 34 वर्षों से सत्ता पर काबिज वामपंथी मोर्चे का सफाया किया था। 2012 में प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन ने उन्हें विश्व के 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में स्थान दिया था। 1970 के दशक में राज्य महिला कांग्रेस का महासचिव बनाया गया। 1970 1984 में ममता ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोकसभा सीट से हराया। वह अखिल भारतीय युवा कांग्रेस का महासचिव रह चुकी हैैंं। उनकी पार्टी एनडीए और यूपीए की सरकार में मंत्रिमंडल में शामिल हुईं।

कमजोरी : ममता बनर्जी एक सशक्त राजनेता होने के बाजवूद उनकी छवि एक भरोसेमंद नेता नहीं है। वो नरसिम्हा राव सरकार, वाजपेयी सरकार और मनमोहन सरकार में मंत्रिमंडल का अहम हिस्‍सा रही हैं। वह हर सरकार में विवादों में घिरींं और मंत्रिमंडल सेे बाहर होने का निर्णय भी खुद ही लीं। गठबंधन धर्म के मामले में उनकी छवि एक कमजोर नेता की है। साथ ही हर मामले में अड़ियल रुख और सख्त मिजाज महिला राजनेता की उनकी छवि रही है जो राष्ट्रीय फलक पर उनकी राह में सबसे बड़ी बाधा साबित हो सकता है।

 

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2. मायावती

ताकत : मायावती बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैंं। कांशीराम के संरक्षण मेें वो उनकी कोर टीम का हिस्सा रहीं हैैं। जब 1984 में बसपा की स्थापना हुई थी तब दलित राजनीति की पुरोधा भारतीय राजनीति में अपना दखल रखने वाली इस दलित महिला ने चार बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की बागडोर संभाली। कई बार राज्यसभा की सदस्य भी रह चुकी हैं। वर्तमान में मायावती महागठबंधन का नेतृत्व कर रही हैं और त्रिशंकु संसद की स्थिति में पीएम पद की प्रबल दावेदारों में से एक हैं।

कमजोरी : मायावती दलित हित में हमेशा से अवसरवादी राजनीति की पैरोकार रही हैं। ममता बनर्जी की तरह उनकी छवि भी गठबंधन धर्म के अनुकूल नहींं रहा है। उनका रुख पार्टी हितों को लेकर हमेशा एकपक्षीय रहा है। कई बार गठबंधन की शर्तों से परे जाकर उन्होंने निर्णय लिया जिसने उन्हें दलित नेता तो बनाया लेकिन भरोसे के मामले में उनके व्यक्तित्‍‍‍व को कमजोर भी किया।

 

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3. नवीन पटानायक

ताकत: ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक अपने युवाकाल में लगभग राजनीति और ओडिशा से दूर ही रहे। 1997 में नवीन पटनायक ने पिता बीजू पटनायक का निधन होने के बाद उन्‍होंने राजनीति में कदम रखा। एक वर्ष बाद ही अपने पिता बीजू पटनायक के नाम पर बीजू जनता दल की स्थापना की। बीजू जनता दल ने बाद में विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की और भाजपा के साथ सरकार बनाई और नवीन पटनायक मुख्यमंत्री बने। उन्होंने भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई और गरीब समर्थक नीतियां अपने ही ढ़ंग से आरंभ किया। नौकरशाही का ठीक से प्रबंधन कर राज्य के विकास के पिता के सपने को मूल आधार बनाया। नवीन पटनायक ओडिशा के लोकप्रिय राजनेता हैं। लगातार चार बार पूर्ण जनाधार के साथ मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे हैं। नवीन पटनायक का नाम ओडिशा के इतिहास में सबसे लम्बे समय तक मुख्यमंत्री बनने का कीर्तिमान है।

कमजोरी: उनका कमजोर पहलू यह है उनकी राष्ट्रीय राजनीति में दखल कम है। वो भाजपा और कांग्रेस सरकार से समान दूरी बनाए रखते हैं, लेकिन समय-समय पर उनका ज्यादा झुकाव भाजपा नेतृत्व के साथ रहा है। तटस्थ राजनीति की वजह से पटनायक खुलकर स्टैंड नहीं लेते हैं और सियासी गुटबाजी से खुद को बचाने की कोशिश करते हैं।

 

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4. जगनमोहन रेड्डी

ताकत: वाईएस जगनमोहन रेड्डी की गिनती आंध्र प्रदेश के बड़े नेताओं में होती है। इनको जगन रेड्डी के नाम से भी जाना जाता है। रेड्डी वाईएसआर कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन रेड्डी विधानसभा में विपक्ष के नेता भी हैं। जगन रेड्डी की पहचान एक नेता के अलावा एक सफल बिजनेसमैन की भी है। राजनीति में कदम रखने से पहले जगन रेड्डी ने 1999-2000 में बिजनेस करियर की शुरुआत की थी। उनका बिजनेस लगातार बढ़ता गया। 2004 में पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी के सीएम बनने के बाद जगन रेड्डी के करियर को उड़ान मिली। तेलुगू अखबार साक्षी और चैनल साक्षी टीवी के फाउंडर भी हैं। 2009 में कडप्पा से संसद पहुंचे। 2009 में जगन के सिर से पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी के निधन के बाद वह आंध्र के सीएम बनना चाहते थे। 2010 में जनयात्रा के लिए निकल लिए। इससे उन्‍हें लोकप्रियता मिली। यात्रा निकालने के लिए उन्‍हें कांग्रेस से निकाल दिया गया। उसके बाद से उनका राजनीतिक संघर्ष जारी है और इस वाइएसआर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आ सकती है।

कमजोरी: आंध्र से बाहर जगन मोहन रेड्डी की पहचान न के बराबर है। कांग्रेस से उनका छत्तीस का आंकड़ा है। अभी राष्‍ट्रीय राजनीति में उनके पास अनुभव नहीं है। इस मामले में उन्‍हें अभी बहुत कुछ सीखने की आवश्‍यकता है। उन्‍होंने केंद्र की राजनीति में भी खुद को तटस्‍थ बनाए रखा है।

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5. के चंद्रशेखर राव

ताकत: के चंद्रशेखर राव तेलंगाना के पहले मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख हैं। छात्र जीवन से ही राजनीति से जुड़े हैं। 1985 में तेलुगू देशम पार्टी में शामिल हुए और विधानसभा चुनाव में उन्हें सफलता मिली। 1987 से 1988 तक वे आंध्र प्रदेश में राज्यमंत्री रहे। 1997-99 के मध्य वे केंद्र सरकार में भी मंत्री रहे। 1999 से 2001 तक चंद्रशेखर राव आंध्र प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष भी रहे। अलग तेलंगाना राज्य की मांग करते हुए उन्होंने तेलुगू देशम पार्टी छोड़ दी और तेलंगाना राष्ट्र समिति का गठन कर 2004 में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लोकसभा चुनाव में उतरे। इस चुनाव में टीआरएस को पांच सीटों पर सफलता मिली। केंद्र की यूपीए-1 सरकार में 2004 से 2006 तक उन्होंने केंद्रीय श्रम और नियोजन मंत्री के पद पर काम किया। जून 2009 तक वे यूपीए सरकार में मंत्री थे, लेकिन अलग तेलंगाना राष्ट्र पर नकारात्मक रवैये को देखकर वो यूपीए से बाहर हो गए। जून 2014 में तेलंगाना राज्य के गठन के बाद उन्होंने राज्य के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। इस साल सितंबर में उन्होंने समय से पहले विधानसभा भंग कर चुनाव में जाने का फैसला किया। वो यूपीए से बाहर हो गए। विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को प्रचंड बहुमत से जीत मिली और वो दूसरी बार लगातार तेलंगाना के सीएम बने।

कमजोरी: के चंद्रशेखर राव की कमजोरी ये है कि उन्‍होंने गठबंधन की राजनीति में अभी तक किसी गुट या दल से खुद को नहीं जोड़ा है। यही वजह है कि आज भी वो राष्‍ट्रीय राजनीति में एक सफल सीएम होते हुए भी अलग-थलग पड़े हुए हैं। अभी तक उन्‍होंने कांग्रेस और भाजपा दोनों से समान दूरी बनाए रखी है। गैर कांग्रेस और गैर भाजपा सरकार का गठन केंद्र में चाहते हैं। वर्तमान में वो थर्ड फ्रंट के गठन को लेकर सक्रिय हैं। उनकी ये मुहिम एनडीए, यूपीए और महागठबंधन में से किसी को सूट नहीं करता है।

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