Modi Government 2.0 :  जानिए क्या हैं 5 बड़ी चुनौतियां

  • कोरोना वायरस संकट और लॉकडाउन ने भारतीय अर्थव्यवस्था ( Indian Economy ) की कमर तोड़कर रख दी है।
  • सीएमआइई सर्वेक्षण के मुताबिक लॉकडाउन ( Lockdown ) की वजह से करीब 12 करोड़ लोग रोजगार गंवा चुके हैं।
  • स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में भारत उन देशों में शामिल है जहां स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च होता है।

By: Dhirendra

Updated: 30 May 2020, 09:59 AM IST

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी ( BJP ) नीति मोदी सरकार 2.0 ( Modi Government 2.0) अपने दूसरे कार्यकाल का पहला साल 30 मई को पूरा करने जा रही है। लेकिन कोरोना वायरस ( Coronavirus ) महामारी के कारण पहली वर्षगांठ बहुत फीका रहेगा। बीजेपी नेतृत्व ने न तो समारोह, न ही कार्यकर्ताओं का कोई सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया है।

वैसे तो मोदी सरकार 2.0 ने दूसरे कार्यकाल के पहले साल में कई ऐसे काम किए हैं जिसे गिना सकती है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि सरकार के समक्ष चुनौतियां ( Challenges ) नहीं हैं। मोदी सरकार के सामने कई चुनातियां हैं, जिसे पूरा करने के बाद ही सरकार सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास हासिल करने का दावा कर सकती है। आइए हम आपको बताते हैं मोदी सरकार की पांच बड़ी चुनौतियां:

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1. धीमी अर्थव्यावस्था (Slowing economy)

भारतीय अर्थव्यवस्था बेहद धीमी रफ्तार से बढ़ रही है। कोरोना वायरस संकट और लॉकडाउन ( Lockdown ) ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़कर रख दी है। कोरोना वायरस संकट के बाद अधिकांश राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने चालू वित्त वर्ष में भारत का विकास दर आधे से भी कम कर दिया है। यानि 6 से 7 फीसदी के पूर्वानुमान के बदले 2.5 से 3.5 फीसदी के बीच रहने का अनुमान जताया है।

देश का बजट घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। माना जा रहा है कि आर्थिक संकट ( Economic Crisis ) से निपटने के लिए 20 लाख करोड़ रुपए की आर्थिक पैकेज की घोषणा के बावजूद विकास के मोर्चे पर मोदी सरकार की मुश्किलें कम होने वाली नहीं हैं।

देश की अर्थव्यवस्था के जानकारों का दावा है कि पहली बार GDP में गिरावट देखने को मिल सकता है। ऐसे में भारत को दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनाने का लक्ष्य हासिल करना मोदी सरकार के लिए कठिन हो सकता है समझा जा सकता है।

2. रोजगार संकट ( Employment crisis )

अप्रैल के प्रथम सप्ताह में सीएमआइई का सर्वेक्षण में बताया कि बेरोजगारी की दर 23.4 प्रतिशत, श्रम-बल की प्रतिभागिता दर 36 प्रतिशत तथा रोजगार की दर 27.7 प्रतिशत है। यानि लॉकडाउन लागू होने के 15 दिनों के अंदर ही नौकरियों का सीधे-सीधे 20 प्रतिशत का होना। काम-धंधे की आयु-वर्ग के लोगों में केवल 27.7 प्रतिशत किसी न किसी रोजगार में हैं।

फिलहाल भारत की आबादी है लगभग 138 करोड़ के करीब है। लगभग 103 करोड़ लोग 15 साल या इससे ज्यादा उम्र के हैं। इस हिसाब से अगर कोरोना-काल तथा लॉकडाउन से पहले फरवरी 2020 की ही बात करें तो भारत में लगभग 40.4 करोड़ लोगों को रोजगार हासिल था। लॉकडाउन के बाद ये आंकड़ा 28.5 करोड़ हो गया। यानि शुरुआती दो हफ्ते में ही करीब 12 करोड़ भारतीयों ने रोजगार गंवाया। आगामी महीनों में बोरोजगारी (Unemployment ) से उत्पन्न असंतोष का सामना देर या सवेर केंद्र को करना ही होगा।

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3. लचर स्वास्थ्य सेवा ( Poor Healthcare )

देशभर में स्वास्थ्य में क्षेत्र में आधारभूत ढांचे की स्थिति पहले से ही लचर है। कोरोना वायरस संकट ने उसकी पोल खोल दी है। कई स्वास्थ्य समस्याओं के बावजूद भारत उन देशों में शामिल है जहां स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च होता है। वर्तमान मोदी सरकार ने आयुष्मान भारत योजना ( Ayushman Bharat Yojna ) लागू कर इस समस्या को दूर करने का प्रयास किया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे संकट का स्थायी समाधान नहीं होगा। आपात स्थिति से निपटने के लिए जरूरी बेड, वेंटिलेटर, सर्जिकल सुविधाएं, अस्पताल भी न्यूनतम स्तर पर देश में उपलब्ध नहीं हैं। निजी अस्पताल उन लोगों के बेमतलब की चीज है जिनके पास आय के साधन कम हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में लचर स्थिति को खुद केंद्र सरकार ने भी स्वीकार कर लिया है।

4. प्रवासी मजदूर ( Migrant Worker )

कोरोना संकट की वजह से देश का जननांकीय संरचना एक बार बदलता नजर आ रहा है। करोड़ो प्रवासी मजदूर जैसे-तैसे शहरों से अपने गृह नगर लौट चुके हैं। देश के 80 फीसदी रोजगार असंगठित क्षेत्र से जुड़ें हैं। असंगठित क्षेत्र में ज्यादातर रोजगार महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, पंजाब, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश में उपलब्ध हैं। इन राज्यों से ही प्रवासी मजदूरों का पलायन हुआ है। तय है कि प्रवासी मजदूरों के घर लौटने से वो बेरोजगार होंगे। दूसरी तरफ इन असंगठित क्षेत्रों को तत्काल मजदूर काम करने के लिए नहीं मिलेंगे। वर्तमान में लॉकडाउन की वहज से कारोबार बंद हैं। प्रवासी मजदूर आजीविका के लिए भी सरकारी सहायता भरोसे काम चलाएंगे। आने वाले दिनों में यही प्रवासी मजदूर सरकार के लिए सिरदर्द साबित होंगे।

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5. पड़ोसी देशों से खराब होते संबंध (Deteriorating relations with neighboring countries )

दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते हस्तक्षेप को देखते हुए भारत को सक्रिय होकर अपने पड़ोसी देशों श्रीलंका, नेपाल, मालदीव, बांग्लादेश, भूटान, म्या़मांर और पाकिस्तान से संबंधों को न केवल सुधारना होगा बल्कि उसे मजबूत करना होगा। चीन ने पिछले कुछ वर्षो में बांग्लादेश, म्यांमार, मालदीव, श्रीलंका, नेपाल में काफी वित्तीय निवेश किया है। चीन नेपाल तक रेल लाइन बना रहा है। श्रीलंका को ऋण के जाल में फंसाकर उसके बंदरगाह हंबनटोटा को 99 साल के लीज पर ले लिया है। चीन के 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल' नीति को मात देने के लिए भारत अपनी 'ऐक्ट ईस्ट' नीति को और ज्यादा प्रभावी बनाना होगा। इतना ही नहीं नेपाल और भूटाल बांग्लादेश का जिस तरह से चीन से नजदीकियां बढ़ रहीं हैं वो भारत के हित में नहीं है। हाल ही में कालापानी ( Kalapani ) मुद्दे पर नेपाल ने भारत से युद्ध लड़ने तक की मंशा जाहिर कर दी है। इसलिए भारत को अपने पड़ोसियों के साथ नए सिरे से संबंध ( Relation ) बनाने होंगे।

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