
नई दिल्ली. पीएम मोदी और सीएम चंद्राबाबू नायडू के बीच बातचीत के बाद भी आंध्र को विशेष दर्जा देने के मुदे पर सार्थक हल न निकलने से दोनेां के बीच गठजोड़ टूटने के कगार पर पहुंच गया है। केन्द्रीय मंत्रिमंडल से टीडीपी के दोनों मंत्रियों के इस्तीफे से 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले ही प्रदेश में नए राजनीतिक समीकरण के संकेत मिलने लगे हैं। एक तरफ जहां सीएम चंद्राबाबू नायडू राजनीतिक दोराहे पर आकर खड़े हो गए हैं वहीं गठबंधन टूटने की स्थिति में बीजेपी को भी नए सहयोगी तलाशने होंगे। दोनों पार्टियों के बीच खटास पैदा होने के बाद इस बात की भी चर्चा होने लगी है कि आखिर इससे फायदा किसको होगा। आपको बता दें कि दूसरे प्रदेशों की तरह भाजपा आंध्र प्रदेश में अपने लिए अलग से जमीन की तलाश में है।
भाजपा में गठजोर को लेकर अलग-अलग राय
राजनीति के जानकारों का मानना है कि पूरे देश में बीजेपी लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रही है लेकिन आंध्र प्रदेश में उसे अकेले दम पर जनाधार बढ़ाने में कड़ी मशक्कत का सामना करना पड़ेगा। ऐसा इसलिए कि पार्टी के अंदर कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने टीडीपी के साथ गठजोड़ का तीखा विरोध किया है। इसमें आरएसएस से आए एमएलए सोमा वीराराजू और कांग्रेस से बीजेपी में आए नेता भी शामिल हैं। इन सबके बावजूद अपने दम पर चुनाव में वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव की दो सीटों और विधानसभा की चार सीटों के आंकड़े को और बढ़ाने में राज्य बीजेपी को काफी मशक्कत करनी होगी। अविविभाजित आंध्र प्रदेश में बीजेपी कभी भी अपने दम पर खाता नहीं खोल पाई थी। ऐसे में बीजेपी के लिए आंध्र प्रदेश के मतदाताओं का दिल जीतना काफी आसान नहीं होगा।
भाजपा के पास करिश्माई नेता का टोटा
बीजेपी के साथ मुश्किल यह भी है कि राज्य में उसके पास चंद्राबाबू नायडू या वाईएसआर कांग्रेस के मुखिया जगन मोहन रेड्डी की तरह कोई करिश्माई नेता नहीं है। एम वेंकेया नायडू के अलावा बीजेपी के पास कोई ऐसा बड़ा नेता नहीं है जिसका व्यापक जनाधार हो लेकिन अब वह भी उपराष्ट्रपति हैं और राजनीति से उन्हें दूर रहना होगा। बीजेपी अगर वाईएसआर कांग्रेस के साथ गठबंधन करने में कामयाब हो जाती है तो उसका भाग्य बदल सकता है। बीजेपी के एक नेता का कहना है कि पार्टी के लिए सबसे अच्छा यह है कि वह टीडीपी के साथ गठबंधन को बरकरार रखे। वर्तमान परिस्थितियों में इस बात की संभावना बेहद कम है। दूसरी तरफ गठबंधन टूटने पर ऐक्टर पवन कल्याण की पार्टी जन सेना के साथ हाथ मिला सकती है। उसके पास वाम दलों को अपने साथ लेने का विकल्प है।
Updated on:
09 Mar 2018 10:26 am
Published on:
09 Mar 2018 10:23 am
