
नई दिल्ली। एक तरफ राहुल गांधी कर्नाटक में मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि 2019 लोकसभा चुनाव में बहुमत मिलने पर वो पीएम बनना चाहेंगे। दूसरी तरफ यूपी में इस महीने के अंत होने वाले उपचुनावों के लिए उन्होंने पार्टी का प्रत्याशी नहीं उतारने का फैसला किया है। उनके इस फैसले से प्रदेश कांग्रेस के नेता भी भौचक्के हैं। उन्हें ऐसा लगने लगा है कि पार्टी अध्यक्ष का ये फैसला राजनीतिक विरोधाभासों से भरा है। यूपी जैसे राज्य में इस तरह से मैदान खाली करने से उनके नेतृत्व क्षमता पर विरोधियों को सवाल उठाने का मौका मिलेगा। अगर मैदान खाली करने का निर्णय इसी तरह लेते रहे तो फिर पीएम बनने के सपने का क्या होगा। हालांकि पार्टी नेताओं का कहना है कि दोनों सीटों पर पार्टी की स्थिति कमजोर है।
पार्टी का प्रत्याशी नहीं उतारने का लिया फैसला
पार्टी हाईकमान ने साफ संकेत दे दिया है कि यूपी के उपचुनाव में कांग्रेस ऐसा कुछ भी नहीं करने वाली है, जिससे महागठबंधन की संभावनाओं को धक्का लगे। इसलिए कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी नहीं उतारने का फैसला लिया है। इसकी वजह यह बताई जा रही है कि पार्टी इस कदम से विपक्ष के महागठबंधन की उम्मीदों को बनाए रखना चाहती है। ताकि इन दो सीटों पर भाजपा को हराया जा सके। कांग्रेस पार्टी नेतृत्व को उम्मीद है कि इस कदम से इन दो सीटों पर भाजपा को टक्कर देने के लिए विपक्ष के महागठबंधन की संभावनाओं में सुधार होगा और 2019 में पार्टी की संभावनाओं को बल मिलेगा।
भाजपा को टक्कर देने की मंशा
प्रदेश के नेताओं का कहना है कि पार्टी नेतृत्व को लगता है कि गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के अंतिम समय में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी ने गठबंधन कर न सिर्फ भाजपा को दोनों सीटों से हराया था, बल्कि दो दशक से सीएम योगी आदित्यनाथ का गढ़ माने जाने वाले गोरखपुर की सीट पर भी सपा-बसपा गठबंधन ने जीत दर्ज की थी। यह अप्रत्याशित जीत से विपक्षी खेमे में उम्मीद की किरण पैदा हुई थी। इससे यह स्पष्ट संकेत गया कि अगर विपक्ष अपने कार्ड सही से खेले तो 2019 में भाजपा को हराना संभव है।
कांग्रेस के लिए कितना लाभकारी
ये बात सही है कि लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी को हराने के लिए विपक्षी पार्टियों का महागठबंधन बनाना जरूरी है। लेकिन यूपी की बात अलग है। ऐसा इसलिए कि यूपी में 80 लोकसभा सीटें हैं। केंद्र में सरकार बनाने का ख्वाब देखने वाले राहुल गांधी अगर इन 80 सीटों पर सपा और बसपा के भरोसे मैदान छोड़ने की बात करते हैं तो यह पार्टी की सेहत के लिए किसी दृष्टि से लाभकारी नहीं होगा। तत्काल इस फैसले का लाभ कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा सीटों पर भाजपा को हराने में भले ही मिल जाए। ऐसा इसलिए कि राजनीतिक जोड़तोड़ में सपा और बसपा पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। आपको बता दूं कि मायावती के एक वोट से अटल बिहारी वाजपेयी को पीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा था। फिर गठबंधन धर्म को लेकर बसपा प्रमुख मायावती कभी विश्वसनीय नहीं रही हैं। इसका अनुभव भाजपा और सपा को सबसे ज्यादा है। इसलिए कांग्रेस के लिए यूपी के चुनावों में प्रत्याशी न उतारने का फैसला राहुल गांधी के पीएम बनने के सपने के लिए सुखद नहीं कहा जा सकता है। वैसे भी राहुल के नेतृत्व में महागठबंधन परवान चढ़ते दिखाई नहीं दे रही है।
Published on:
10 May 2018 12:12 pm
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