
तेलंगाना: मुस्लिम वोटों पर टीआरएस और कांग्रेस का दावा मजबूत, ओवैसी की पार्टी का 8 सीटों पर दबदबा
नई दिल्ली। तेलंगाना में 119 सीटों पर विधायकी के चुनाव को लेकर चुनाव प्रचार चरम पर है। भाजपा जहां उत्तर भारत की तरह दक्षिण के इस राज्य में भी वोटों के ध्रुवीकरण में जुटी है ताकि उसे ज्यादा से ज्यादा हिंदू मतदाताओं को वोट मिल सके। वहीं मुस्लि मतदाताओं का रुझान के बारे में अभी तक स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं। उम्मीद इस बात की है कि इस बार मुस्लिम वोट सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) और विपक्षी कांग्रेसनीत पीपुल्स फ्रंट के बीच बंट सकता है। हालांकि इस वोट पर एआईएआईएम ओवैसी का दावा सबसे ज्यादा मजबूत है, लेकिन वो पहले कि तरह मुस्लिम वोटों पर पकड़ बनाए रख पाएंगे या नहीं इस बात को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है।
आधी सीटों पर गतिण बिगाड़ने की क्षमता
राज्य की 3.51 करोड़ की आबादी में 12 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी है। इन मतदाताओं के बीच पकड़ टीआरएस और पीपुल्स फ्रंट के नेताओं की ज्यादा है। यही कारण है कि मुसलमान मतदाताओं वाली सीटों पर सीधी लड़ाई इन्हीं दोनों के बीच में है। तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) और तेलंगाना जन समिति (टीजेएस) व उसकी अन्य सहयोगी कांग्रेस नेतृत्व में महागठबंधन के तहत चुनाव लड़ रहे हैं। राज्य की राजधानी हैदराबाद और कुछ अन्य जिलों में मुस्लिम वोटर अच्छी संख्या में हैं। वे इस स्थिति में हैं कि सात दिसंबर को विधानसभा चुनावों में 119 विधानसभा क्षेत्रों में से करीब आधी सीटों पर वोटों के गणित को बिगाड़ सकते हैं। हैदराबाद में 10 सीटों पर मुस्लिम मतदाता 35 से 60 फीसदी और राज्य की करीब अन्य 50 सीटों पर 10 से 40 फीसदी के बीच मौजूद है।
मुस्लिम संगठनों का टीआरएस को समर्थन
मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एमआईएमआईएम) ने सिवाए आठ सीटों के सभी सीटों पर टीआरएस को समर्थन दिया हुआ है। इन आठ पर उसके उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। इससे सत्तारूढ़ पार्टी को अपने प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ थोड़ी राहत जरूर मिल सकती है। जमात-ए-इस्लामी ने भी टीआरएस को समर्थन देने की घोषणा की है जबकि जमीअत उलेमा-ए-हिन्द ने कांग्रेस को समर्थन दिया है। विभिन्न मुस्लिम धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों के समूह युनाइटेड मुस्लिम फोरम भी टीआरएस को समर्थन के मुद्दे पर बंटा हुआ दिखाई दे रहा है। फोरम को एमआईएम के करीबी के तौर पर देखा जाता है। टीआरएस का समर्थन करने वाले संगठन दलील दे रहे हैं कि टीआरएस के साढ़े चार साल के शासन में कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ और उसने मुस्लिमों के विकास और कल्याण के लिए कई कदम उठाए हैं।
Published on:
03 Dec 2018 01:54 pm
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