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किसानों को खेती में नहीं मिल रही पूरी मेहनत, खेतों की गुणवत्ता में आने लगी कमी

मिट्टी की सेहत बिगडऩे के साथ ही उपज में होने लगी कमी, परम्परागत और जैविक खेती अपनाने पर बढ़ेगी गुणवत्ता

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किसानों को खेती में नहीं मिल रही पूरी मेहनत, खेतों की गुणवत्ता में आने लगी कमी

किसानों को खेती में नहीं मिल रही पूरी मेहनत, खेतों की गुणवत्ता में आने लगी कमी

अरनोद. राजस्थान पत्रिका भीलवाड़ा संस्करण के 24वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित पत्रिका फेस्ट के तहत 25 से एक जनवरी तक पूरे सप्ताह विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। इसी कड़ी में गुरुवार को अरनोद में किसान गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें किसानों ने जहां अपनी विभिन्न समस्याएं रखी। वहीं कृषि विशेषज्ञों और प्रगतिशील किसानें ने समस्याओं के समाधान के लिए उपाय भी बताए। इस मौके पर किसानों ने खेती में हो रहे बदलाव, नई तकनीक के साथ परम्परागत खेती और मिट्टी को बंजर होने सेे बचाए रखने को लेकर चर्चा की गई। अरनोद के गौतमेश्वर रोड पर किसान गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें वर्षों से खेती करते आ रहे किसानों के साथ युवा किसानों ने भी अपने विचार साझा किए। जिसमें प्रमुख रूप से सामने आया कि गत कुछ वर्षों से किसानों को खेती में लागत और अपनी मेहनत भी नहीं मिल रही है। इसके साथ ही सामने आया कि गोबर की खाद के अभाव में मिट्टी की पोषक तत्वों में कमी हो रही है। इसके परिणाम स्वरूप उपज की गुणवत्ता में कमी आ रही है। वहीं खाद्यान्न की गुणवत्ता में भी कमी होती जा रही है। इसके लिए किसानों ने जैविक खाद और जैविक खेती करने के बारे में बताया।

बिजली की समस्या
किसानों ने बताया कि गत वर्षों से किसानों को पर्याप्त बिजली नहीं मिल पा रही है। निर्धारित किए गए 6 घंटे बिजली नहीं मिल पा रही है। जो बिजली मिलती है, उसमें भी एक-एक घंटे का अंतराल रहता है। जिससे किसानों को फसलों में सिंचाई के लिए खेतों में इंतजार करना पड़ रहा है। ऐसे में सिंचाई समय पर नहीं हो पा रही है।

रोजड़ों की समस्या
गत कुछ वर्षों से रोजड़ों की समस्या काफी बढ़ गई है। जो खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचा रहे है। किसानों का कहना है कि दो वर्ष पहले तक तो किसानों को देखकर रोजड़े खेतों से भाग जाते थे। लेकिन अब रोजड़े खेतों में ही विचरण करते रहते है। जिससे किसानों की फसलें चट हो रही है। इस पर कृषि विभाग के अधिकारी रतनलाल डामोर ने कहा कि इसके लिए किसानों को समूह में तारबंदी योजना में आवेदन करना होगा। जिस पर कृषि विभाग की ओर से अनुदान दिया जाता है।

बढ़ाया जाए समर्थन मूल्य
किसानों ने बताया कि खेती में खर्चा काफी बढ़ गया है। इसकी तुलना में जो समर्थन मूल्य घोषित है। वो काफी कम है। इसके लिए सरकार को समर्थन मूल्य बढ़ाया जाना चाहिए। वहीं सभी फसलों को समर्थन मूल्य घोषित करना और सभी जिलों में खरीद होना चाहिए।

नहीं मिलता फसल बीमा
किसानों ने बताया कि गत समय से जिले के किसानों को फसली बीमा नहीं मिल रहा है। जबकि उनकी किस्त बैंक और सहकारी समितियों के माध्यम से काटी जा रही है। ऐसे में दोहरा नुकसान हो रहा है। किसान संघ के संभाग प्रभारी कर्नल जयरााजसिंह ने बताया कि किसानों की फसली बीमा में बोई गई फसल के बजाय अन्य फसल का बीमा दर्शाया जा रहा है। जिससे भी उन्हें फसली बीमा नहीं मिलता है। किसानों ने कहा कि कई बार बीमा कम्पनी के प्रतिनिधियों की ओर से प्राकृतिक नुकसान में कमी अंकित की जाती है। जिससे भी बीमा नहीं मिलता है। ऐसे में किसानों ने इस संबंध में कृषि विभाग के अधिकारियों का इस संबंध में उच्चाधिकारियों तक समस्या पहुंचाने के लिए कहा।

कम होती उर्वरा शक्ति को बचाना होगा
किसानों ने बताया कि गत वर्षों से खेती की उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। जिससे उपज पर भी प्रभाव पड़ रहा है। इसे बचाए रखना आवश्यक है। इसके लिए जैविक खेती और रसायानों का उपयोग कम करने पर चर्चा की गई। जिसमें बताया गया कि गोबर की खाद का उपयोग करना होगा। इसके अलावा खेतों में फसलों के अवशेष को डी-कम्पोजर से जैविक खाद बनाकर उपयोग करने से भी खेतों की उर्वरा शक्ति बनी रह सकती है।

समय पर नहीं मिलता खाद
हर वर्ष किसानों को समय पर खाद नहीं मिलने की समस्या रहती है। जिससे फसल के उत्पादन पर भी काफी प्रभाव होता है। किसानों ने बताया कि इस वर्ष भी किसानों को समय पर ना तो डीएपी मिला और ना ही यूरिया मिला। कई किसानों ने अधिक दामों में यूरिया खरीदना पड़ा। ऐसे में किसानों ने सरकार से गुहार लगाई कि समय पर किसानों को खाद उपलब्ध हो जाए तो समस्या का हल हो सकेगा।

नैनो यूरिया बन सकता है विकल्प
किसानों की कई समस्या का हल नैनो यूरिया हो सकता है। किसानों की गोष्ठी में इफको के क्षेत्रीय अधिकारी मुकेश आमेटा ने बताया कि नैनो यूरिया से जहां मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। वहीं फसल ज्यादा स्वस्थ होने के साथ उत्पादन और गुणवत्ता भी अच्छी रहती है। उन्होंने कहा कि नैनो यूरिया का उपयोग कर फसल उत्पादन में होने वाले नुकसान से बच सकता है। दानेदार यूरिया की तुलना में नैनो यूरिया फसल में दुगुने समय तक असरदायक रहती है। इसके उपयोग से कीड़े एवं बीमारियों का प्रकोप कम होता है। उन्होंने इसे उपयोग के बारे में भी जानकारी दी। इस मौके पर उन्होंने जो किसान नैनो यूरिया का उपयोग कर रहे है। उनके अनुभवों के बारे में भी बताया।