
आदिवासियों का हरिद्वार है गौतमेश्वर महादेव
अरनोद. कांठल, मेवाड़, मालवा और वागड़ क्षेत्र के लोगों के लिए श्रद्धा का केन्द्र और तीर्थ के रूप में अलग ही पहचान रखने वाला गौतमेश्वर महादेव का मंदिर अति प्राचीन है।कहा जाता हैकि यह शिवमंदिरों में एक ऐसा मंदिर है जहां खंडित शिवलिंग की पूजा की जाती है।
अरावली पर्वतमालाओं के बीच झूलते प्रस्तर खंडों के मध्य में गौतमेश्वर महादेव मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग है। इसके साथ ही यहां गुफा भी है, जिसमें आदिकाल के कुछ प्रमाण भी मिलते है।
कहा जाता है कि यहां गौतम ऋषि ने तपस्या की थी। गोहत्या का दोष का निवारण यहीं पर गंगाकुंड में स्नान और गौतमेश्वर महादेव के पूजा-अर्चना और अभिषेक के बाद हुआ। उसके बाद वे नीचे पहाड़ी क्षेत्र में तपस्या करने लगे। इसके बाद से ही यहां मंदाकिनी गंगा कुंड में स्नान के बाद दर्शन से विभिन्न दोषों का निवारण होने लगा। सन् 13 सौ के करीब गौतमेश्वर महादेव मंदिर पर मालवा के सुल्तान ने आक्रमण किया। कहा जाता है कि यहां मंदिर को क्षतिग्रस्त करने के बाद सैनिकों ने शिवलिंग पर बड़े हथौड़े से वार किया। वार करने के बाद यहां से मधुमक्खियों ने सेना पर हमला कर दिया। सेना के ऊपर एक बड़ी चट्टान भी गिरी जो आज भी मंदिर के सामने है। उसके बाद मुगल शासकों ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया और मंदिर के बाहर एक शिलालेख भी लगवाया। तब से लेकर आज तक यह मेवाड़, मालवा, वागड़ और कांठल के लोगों की आस्था का प्रतीक है। वहीं यह स्थान आदिवासियों के हरिद्वार के रूप में भी जाना जाता है। इसके साथ ही इस तीर्थ के बिना तीर्थ यात्रा अधूरी मानी जाती है।
यहां मिलता है पापमुक्ति प्रमाण पत्र
भारतवर्ष में एकमात्र तीर्थ है, जहां स्नान और दर्शन के बाद विभिन्न दोषों के निवारण के लिए पापमुक्ति प्रमाण पत्र दिया जाता है। पापमुक्ति की यह व्यवस्था कई वर्षों से चली आ रही है।यहां प्रतिवर्ष वैशाख मास की बुद्ध पूर्णिमा को लक्खी मेला भरता है।
Published on:
11 Feb 2018 10:29 am
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