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होली का डांडारोपण, 9 को होली व धुलेंडी 10 को, कांठल में होली पर मनाया जाता हैं शोक

होली का डांडारोपण, 9 को होली व धुलेंडी 10 को, कांठल में होली पर मनाया जाता हैं शोक

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होली का डांडारोपण, 9 को होली व धुलेंडी 10 को, कांठल में होली पर मनाया जाता हैं शोक

होली का डांडारोपण, 9 को होली व धुलेंडी 10 को, कांठल में होली पर मनाया जाता हैं शोक

प्रतापगढ़. जिले में कई जगहों पर होली का आगाज डांडा रोपण के साथ हो गया हैं। पहले डांडा रोपण के साथ ही होली की मस्ती शुरू हो जाती थी। आज यह एक केवल परंपरा रह गई है। इस परम्परा को कई जगह अब भी नियमित रूप से निभाया जा रहा है। जिस स्थान पर होली दहन होता है, वहां एक बड़ा सा डंडा लगाया जाता है। यह डंडा भक्त प्रहलाद का प्रतीक होता है। इस वर्ष होलिका दहन 9 मार्च को किया जाएगा। अगले दिन 10 मार्च को रंगों की होली मनाई जाएगी। इसमें लोग एक दूसरे को रंग लगाकर और गुलाल से होली खेलते हैं। पंचांग के अनुसार इस वर्ष होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 2 घंटे 24 मिनट तक का हैं। पुराने समय में डांडा रोपण के साथ ही होली की मस्ती भी शुरू हो जाती थी, कहीं फागुन गीत गए जाते है कहीं पर होली के प्रबंधन की तैयारी शुरू हो जाती थी। पूरे एक माह तक मस्ती और हंसी ठिठोली का माहौल रहता था। लेकिन वर्तमान समय में इस भागदौड़ भरी जिंदगी में कुछ त्योहार मान्यता भर ही रह गये है। डांडा रोपना की प्रक्रिया अब कई जगह नहीं होती लेकिन अब भी इस मान्यता को कुछ जगहों पर उस प्रकार ही मनाया जाता है।
जिस स्थान पर होली दहन होता है वहां एक बड़ा सा डंडा लगाया जाता है। यह डंडा भक्त प्रहलाद का प्रतीक होता है। एक महीने बाद होली का दहन से ठीक पहले इसे सुरक्षित निकाल लिया जाता है। हालांकि अब अधिकांश जगह यह डांडा होलिका दहन से कुछ देर पहले रोपण कर खानापूर्ति की जाती है। होलिका दहन चंदे से होता है। इसके लिए चंदा जुटाने का काम भी होली का डांडा रोपे जाने के बाद शुरू हो जाता था। टोलियां मोहल्ले या गांवों में घूम-घूम कर चन्दा तथा होलिका दहन में दहन किए जाने वाले सामान को जुटाती थीं।

राजपरिवार में हुई घटना को लेकर कांठल में मनाया जाता है शोक
देशभर में होली का पर्व हर्षोलास के साथ मनाया जाता है। होली पर लोग एक दूसरे को रंग और गुलाल लगाकर आपसी मतभेद को भूलकर एक दूसरे को गले लगाकर बधाइयां देते हुए दिखाई देते है। लेकिन कांठल में होली के दिन शोक मनाते हैं और गम में डूबे रहते हैं। यहां पर कोई एक दूसरे को रंग और गुलाल नहीं लगाता। रंगों के त्यौहार होली पर यहां सन्नाटा पसरा रहता है। प्रतापगढ़ में होली जलाने के बाद दूसरे दिन धुलण्डी पर लोग ना तो एक दूसरे को रंग लगाते हैं। ना ही फाग के गीतों की मस्ती यहां नजर आती है। नजर आता है तो सिर्फ सन्नाटा। यहां के बाजारों में सामान्य चहल पहल रहती है। प्रतापगढ़ और आस पास के ग्रामीण इलाकों में लोग होलिका दहन तो करते हैं, लेकिन दूसरे दिन धुलंडी का पर्व नहीं मनाते हैं। कभी यहां पर भी रंगों का यह त्यौहार बड़े उमंग और उत्साह के साथ मनाया जाता था। लोग एक दूसरे पर रंग और गुलाल लगाते थे। स्थानीय लोगों का कहना है कि करीब दो सौ साल पहले रियासत कालीन दौर में जब प्रतापगढ़ भी एक रिसासत थी, यहां राजपरिवार में होली पर किसी की मौत हो गई थी तो तभी से यहां पर होली नहीं खेली जाती है। स्थानीय लोग आज भी होली से बारह दिनों तक उस घटना को शोक मनाते हैं और रंग व गुलाल नहीं लगाते हैं। हिंदू संस्कृति में परिवार के किसी सदस्य की मौत होने पर बारह दिनों तक शोक रहता है, कोई खुशी का कार्यक्रम नहीं होता है और 13 वें दिन उस शोक का निवारण किया जाता है। उसी प्रकार राजपरिवार में हुई उस घटना के 13 वें दिन यहां पर रंग तेरस का पर्व मनाया जाता है। लोग यहां तेरस को होली पर्व के रूप में मनाते हैं और एक दूसरे पर रंग और गुलाल लगाते है। सरकार की और से भी उस दिन जिला कलक्टर द्वारा सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की जाती है और ये परम्परा वर्षों से चली आ रही है। हालांकि अब धिरे-धिरे कई स्थानों पर गेर नृत्य के आयोजन के साथ बाहर से आने वाले लोग होली का पर्व भी मनाने लगे हैं।