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दिव्य औषधियों का खजाना है सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य

सरकार से हैं संरक्षण की आस: कई दुर्लभ वनौषधियों को पहचान की दरकार  

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दिव्य औषधियों का खजाना है सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य

दिव्य औषधियों का खजाना है सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य

अभयारण्य में पाई जाती है कई प्रकार की आर्किड भी
अब तक हुई ११ प्रकार की आर्किड की हुई पहचान
प्रतापगढ़. जिले के प्रमुख सीतामाता अभयारण्य कई मायनों में खास है। यह अभयारण्य जैव विविधता का संगंम है। ऐसे में यहां कई दिव्य औषधियों की भरमार है। लेकिन इन औषधियों की पहचान नहीं होने से इसकी उपयोगिता नहीं हो पा रही है। ऐसे में इन औषधियों की पहचान आवश्यक है। इन वनस्पतियों में ऑर्किड भी शामिल है। इस ऑर्किड से कई प्रकार की औषधियां बनाई जाती है। सीतामाता अभयारण्य में पाई जाने वाले इस वनस्पतियों के परिवार का ङ्क्षहदी नाम भी ऑर्किड ही है। सीतामाता अभयारण्य में अब तक ११ प्रकार के ऑर्किड की पहचान हो चुकी है। प्रदेश में अब तक स्थलीय ऑर्किड्स की 13 तथा उपरिरोही की 6 प्रजातियां रिकॉर्ड की गई है और चट्टानी ऑर्किड्स भी देखे गए हैं। जबकि सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य में 11 प्रकार के ऑर्किड प्लांट््स अब तक दिखाई दिए हैं। जिनमें युलोफिया ऑक्रिटा, हबेनरिया फुर्सेफेरा, पेरिस्टाइलस कॉस्ट्रीक्ट्रस, वंडे टेलेसटा, एक्मेपे प्रेमोर्सा, ऐरिडेस क्रिस्पम, नेर्विलिया ऑर्गोना, हबेनरिया डिजिटेेटा, जिओडोरम रेक्रूवम, हबेनरिया मेर्जिनाटा, हबेनरिया प्लांटिजिनिया की पहचान हो गई है। यह प्रजातियां अब तक ज्ञात है। इनमें 3 प्रकार के ऑर्किड वृक्षिय उपरीरोही हैं। अन्य 8 स्थलीय ऑर्किड है।
काफी महत्वपूर्ण हैं दक्षिणी राजस्थान के जंगल
राजस्थान के अन्य वनों फुलवारी की नाल सेंचुरी, उदयपुर, माउंट आबू सेंचुरी में भी स्थलीय और वृक्षीय ऑर्किड्स पाए जाते हैं। लेकिन अपनी जैव विविधता के लिए मशहूर सीतामाता अभयारण्य ऑर्किड्स को लेकर भी काफी समृद्ध है। मुख्य रूप से महुआ, आम, तेंदू, बहेड़ा, चिरौंजी, उम्बिया, आसन, अर्जुन आदि के वृक्षकुंज इनके आश्रय है। अभी भी यहां नए ऑर्किड प्रजातियों के लिए अध्ययन और सर्वेक्षण की संभावनाएं हैं। दक्षिणी राजस्थान में अब तक केवल स्थलीय और वृक्षीय ऑर्किड्स ही मिलने की पुष्टि हो पाई है।
कई बीमारियों में होता है उपयोग
ऑर्किड परिवार की प्रजातियों में एंटी-ऑक्सीडेंट, एंटी ङ्क्षजग, एंटी कैंसर, एंटी बायोटिक, एंटी फंगल, एनाल्जेसिक, एंटी मेटिक और कामोद्दीपक गुण होते है। यह मनोरोग, किडनी रोग, मोटापा, पाचनतंत्र के रोग और आमवात में विशेष लाभ प्रदान करती है। ऑर्किड के फूलों में विटामिन ए और सी प्रचुर मात्रा में होता है जिसके नियमित सेवन से त्वचा की रौनक बनती है और नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। कुछ ऑर्किड्स में संज्ञा शून्यता के प्रभाव लाने वाले गुण भी पाए जाते हैं उनसे एनेस्थेटिक दवा बनाई जा सकती है। सैंकड़ों ऑर्किड्स के कई मेडिसिनल प्रयोग हर्बल जानकारों द्वारा किए जाते हैं। इन दुर्लभ परजीवी पौधों के बारे में अभी और रिसर्च चल रही है।
ऑर्किड्स के औषधीय महत्व
ऑर्किड्स आयुर्वेद की संहिताओं में वर्णित अष्टवर्ग औरजीवनीयवर्ग की औषधियों में भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। आयुर्वेद की 64 दिव्य वनस्पतियों में भी ऑर्किड परिवार के कुछ पौधे आते हैं। च्यवनप्राश का प्रमुख घटक अष्टवर्ग की जड़ीबूटियों में से 4 जीवक ऋषभक, रिद्धि और वृद्धि भी दुर्लभ ऑर्किड ही है। महान औषधीय पौधे जीवंती, हेम जीवंती, सिद्धि, रासना, पंचक क्वाथ का मुख्य घटक मानकंद, सालमपंजा, सफेद मूसली, प्रजाति, पगुला, रुबांदा आदि कई पौधे ऑर्किड जाति के ही है। कई विशेषज्ञ कर रहे हंै रिसर्च
उदयपुर के फुलवारी की नाल अभयारण्य में वन विभाग द्वारा डॉ. सतीश शर्मा के निर्देशन मार्गदर्शन में ऑर्किड संपदा के संरक्षण व जागरूकता लाने के उद्देश्य से एक ऑर्किड उद्यान बना कर राजस्थान के ऑर्किड्स का संग्रह किया गया है। वन, जीवन वैज्ञानिक, जैवविविधता विशेषज्ञ और संरक्षक डॉ. सतीश शर्मा ने कई ऑर्किड प्रजातियों को खोजा है। इसके साथ ही डॉ. धर्मेंद्र खंडाल ने भी बहुत काम किया है। इसके साथ ही ऑर्किड्स के संरक्षण में डॉ. सुनील दुबे भी कार्य कर रहे है। अभयारण्य में पहचान और संरक्षण की आवश्यकता
&सीतामाता अभयारण्य में पसरते खेत, चट्टानों से बहते भूमिगत जल के स्रोतों का अनियंत्रित दोहन और दावानल के कारण ऑर्किड्स के साथ साथ अन्य पादप भी कम होती जा रही ही है। अभयारण्य की प्रकृति और प्रवृत्ति भी धीरे-धीरे बदल रही है।् अभयारण्य के अलावा प्रादेशिक वनों में ऑर्किड संरक्षित क्षेत्र घोषित कर यथा स्थान संरक्षण के उपाय शुरू करने की आवश्यकता है। यहां ऑर्किड ट्रेल्स बनाया जा सकता है। जो इको टूरिज्म में नया आकर्षण हो सकता है। इससे पर्यावरण के एक और पहलू के प्रति जागरूकता पैदा की जा सकेगी। मंगल मेहता, पर्यावरणविद्, प्रतापगढ़

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