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युद्ध के वे दिन याद करके आज भी फडक़ उठती है सैनिकों की भुजाएं

(pratapgarh news)अरनोद के दो भाइयों ने भी लिया था युद्ध में भागसेवानिवृृत्त कर्नल जयराज ने पत्रिका से साझा की पुरानी यादें(kargil war)

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pratapgarh


प्रतापगढ. देशभर में शुक्रवार को करगिल विजय दिवस मनाया गया। युद्ध में शामिल रहे सैनिकों की वीरता के किस्से याद किए जा रहे हैं। इस युद्ध में भाग लेने वाले रणबांकुरों में अरनोद के भी दो सैन्य अधिकारी हैं। इनमें से एक कर्नल जयराज सिंह ने पत्रिका से बातचीत में युद्ध की यादें साझा की। वे बताते हैं कि वे दिन याद करके आज भी भुजाएं फडकऩे लगती हंै। उस दौरान कर्नल जयराज की तैनाती करगिल के निकट ही सेना की एक स्पेशल विंग ‘काउंटर इनसर्जेंसी फोर्स-डेल्टा के मुख्यालय कश्मीर के बटोट में थी। इस यूनिट का काम दुश्मन के छिपने के ठिकानों का पता लगाकर उन्हें नेश्तनाबूत करना था। इसी युद्ध में कर्नल जयराज के छोटे भाई एयर कोमोडोर चन्द्रमौलि ने स्क्वाड्रन लीडर के रूप में वायुसेना की ओर से हिस्सा लिया और दुश्मन के ठिकानों पर बमबारी की। कर्नल जयराज वर्ष 2000 में सेना से सेवानिवृत्त हो गए थे। कुछ वर्षों तक सैनिक कल्याण अधिकारी के रूप में सेवाएं दी। इसके बाद कॉरपोरेट सेक्टर में भी कई जगह काम किया।

यहां पेश है युद्ध के संस्मरण कर्नल जयराज के शब्दों मेें ही...
मेरी शुरूआती तैनाती 16 ग्रनेडियर्स नाम की पलटन में बतौर सैकण्ड लेफ्टिनेंट हुई। यह वही पलटन थी, जिसने करगिल युद्ध में सबसे पहले दुश्मन का सामना किया। वर्ष 1998 तक मैं नसीराबाद में तैनात था। बाद में मेरा तबादला सेना की काउंटर इनसर्जेंसी फोर्स डेल्टा यूनिट में बटोट में हो गया। बटोट कश्मीर में करगिल के पास ही एक स्थान है। जहां डेल्टा का हैडक्वार्टर है। पूरे युद़्ध के दौरान मेरी पोस्टिंग वहीं रही। नसीराबाद से मैं और मेजर राजेन्द्र प्रसाद कारगिल गये थे। मेजर राजेन्द्र प्रसाद मुठभेड़ में शहीद हो गये। मेजर राजेन्द्र उस समय नियमित गश्त पर थे। उसी समय पाकिस्तानी सैनिकों ने घात लगाकर हमला किया, लेकिन मेजर राजेन्द्र ने बहादुरी से दुश्मन का मुकाबला किया और शहीद हो गए। युद्ध के दौरान मैं भी अपनी टीम के साथ कश्मीर के डोडा सहित अन्य ऐसे दुर्गम इलाकों में गया, जहां दुश्मन के सैनिक और आतंकवादी छिपे रहते थे। कई दुश्मनों को हमने मौत के घाट उतारा। उस समय क्या सैनिक हो और क्या अधिकारी, सबका उत्साह देखते ही बनता था। वे दिन याद करके आज भी भुजाएं फडकऩे लगती है। दुश्मन ने भले ही धोखे से हमारी सीमा में प्रवेश किया हो लेकिन हमारी सेना ने उसका वीरतापूर्वक जवाब दिया और दुश्मन को खदेडकऱ ही दम लिया। उस दौरान मेरे पिताजी का स्वास्थ्य खराब था, लेकिन मैं युद्ध खत्म होने के बाद ही घर लौटा। बाद में पिताजी की देखभाल के लिए सेना से सेवानिवृत्ति ले ली।...’
भाई चन्द्रमौलि ने भी बरसाए दुश्मन पर बम
मेरे लिए फक्रकी बात यह भी है कि हवाई बमबारी में मेरे छोटे भाई स्क्वाड्रन लीडर, बाद में एयर कोमोडर चन्द्रमौलि ने भी भाग लिया। उन्होंने मिग 21 विमान उड़ाकर दुश्मन पर बम बरसाए। उनके इस साहसिक कार्य के लिए बाद में भारत सरकार ने उन्हें विशिष्ट सेवा मेडल से नवाजा। हम दोनों भाइयों को गर्व है कि हम हमारी पैतृक भूमि अरनोद प्रतापगढ़ राजस्थान का मान रख सके। माता पिता की परवरिश, गांव के बुजुर्गों का आशीर्वाद, सैनिक स्कूल चित्तौडगढ़़ की सिखलाई और सशस्त्र सेना की ट्रेनिंग से ही यह संभव हो पाया।
पाकिस्तान ने धोखे से की थी शुरूआत
कश्मीर में सीमावर्ती पोस्ट भारी सर्दी के दौरान खाली कर दी जाती है। ऐसा दोनों देशों के सैनिक करते हैं। इसीके तहत करगिल की पोस्ट सर्दियों में खाली कर दी गई। उन खाली पोस्टों पर ही अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर पाकिस्तान के कब्जा जमा लिया। इसकी जानकारी स्थानीय गुर्जर आदि चरवाहों ने सेना को दी। उस समय अग्रिम मोर्चे पर सेना की 18 गर्नेडियर्स की टुकड़ी तैनात थी। उसने वीरता का परिचय दिया और दुश्मन से लोहा लिया। इस पलटन में ग्रर्नेडियर यादव भी थे। जिन्होंने अकेले ही कई दुश्मन सैनिकों को मौत के घाट उतारा। बाद में उनको परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। चूंकि प्रारंभिक दौर में पूरी सूचना नहीं थी। इसलिए हमारी सेना को शुरूआताी दौर में काफी नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन बाद में सेना और वायुसेना ने मिलकर अदम्य साहस का परिचय दिया और दुश्मन को उलटे पैर भागने पर मजबूर कर दिया।

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