
यूपी के इस गांव में नहीं लगाते दरवाजे
प्रतापगढ़. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार अपराध के नाम पर विपक्ष के निशाने पर है। पूरे यूपी में क्राइम का ग्राफ बढ़ा हुआ है। पर सूबे का एक गांव ऐसा भी है जहां लोग अपने घरों में दरवाजे तक नहीं लगाते। यहां के लोगों को न तो चोरी-डकैती का डर है और न तो जान-माल की सुरक्षा की चिंता। पर इसके लिये पुलिस को शाबाशी देने की जरूरत नहीं। इसमें पुलिस का कोई रोल नहीं। गांव वालों की बेफिक्री की वजह कुछ और है।
आज जहां चोरी और लूट की वारदात आम बात है और इससे बचने के लिये लोग अपने घरों को तरह-तरह की सुरक्षा से लैस करते हैं। विशेष सुरक्षा प्रबंध किया जाता है। पर प्रतापगढ़ जिले के सुड़ेमऊ गांव की बात ही अलग है। यहां के लोगों को चोर-डाकू का कोई डर नहीं। यहां तक कि घरों में दरवाजा ही नहीं चौखट-बाजू भी नहीं। सो दिन-रात जब चाहे आइये और जब चाहे जाइये।
गांव वालों के निडर होने के पीछे पुलिस का कोई रोल नहीं। दरअसल यह मामला धार्मिक विश्वास से जुड़ा है। कुछ लोग इसे अंधविश्वास का नाम भी देते हैं पर ग्रामीण इससे सहमत नहीं। दरअसल गांव के लोगों के मन से चोरी-डकैती का डर निकलने और बिना दरवाजों का घर बनाने के पीछे एक पुरानी घटना है, जिसकी पूरे गांव में मान्यता है।
सुड़ेमऊ गांव में ऐसी मान्यता है कि उनके पूर्वजों के समय किवाड़ बंद करते समय एक नागिन का बच्चा दरवाजे और चौखट के बीच दबकर मर गया। इसके बाद नागिन ने गुस्से में श्राप दे दिया कि अगर इस कुल के लोग घरों में दरवाजा लगाएंगे तो इनके वंश का विनाश हो जाएगा। धन और सम्पत्ति का भी नुकसान होगा। सात-आठ पीढ़ी पहले यहां बसे इनके पुरखों ने इन्हें यह सीख दी कि वह भी इसका पालन करें और इसके चलते गांव में लोग चौखट-दरवाजा नहीं लगाते।
ग्रामीणों की मानें तो बुजुर्गों की दी हुई सीख अब उनके लिये परंपरा बन चुकी है। वह लोग इसका निर्वाह किसी परंपरा के हतत ही करते हैं। इतना ही नहीं गांव के लोग बताते हैं कि जिस कुल को श्राप मिला था उसके कुछ लोगों ने अपने घर में दरवाजे लगाये तो कोई न कोई अनहोनी जरुर हुई। किसी का पुत्र असमय मौत का शिकार हुआ तो किसी का भाई और किसी का पिता। लोग तो यहां तक दावा करते हैं कि दरवाजा उखाड़ फेकने के बाद फिर सब कुछ सामान्य हो गया।
गांव में पढ़े लिखे ब्रह्मणों कि आबादी है जिसमे कोई डॉक्टर, इंजीनियर है तो कोई अधिवक्ता या शिक्षक है। उन लोगों का विश्वास है कि नाग देवता उनके घरों की रक्षा करते हैं। यही वजह है कि आज तक वहां चोरी-डकैती की कोई घटना नहीं हुई। इसीलिए हम अपने घरों की चिंता नहीं करते। सुड़ेमऊ गांव में सैकड़ों घर हैं, जिनमें से कुछ कच्चे भी हैं और कुछ पक्के और झोंपड़ी में भी लोग रहते हैं। आकार के हिसाब से घर भले जैसे हों पर सबमें एक समानता है कि वहां चौखट और दरवाजे नहीं।
ग्रामीण विजय नरायण मिश्रा कहते हैं कि ये बात बाकी लोगों के लिये चौंकाने वाली हो सकती है, लेकिन हमारे लिए यह परंपरा बन चुकी है। दशकों से हम बिना दरवाजे के घरों में रहते चले आ रहे हैं। गांव की राजकुमारी देवी का दावा है कि उनकी सास ने सियार से बचने के लिये लोहे का जंगला लगाया था। जब जंगला हटाया तब जाकर औलाद हुई और बची। विजय नारायण का भी कुछ ऐसा ही दावा है। वह कहते हैं कि उनके बाबा ने गांव की घनी बस्ती से निकलकर बाहर घर बनाया और दरवाजा लगवा दिया। उसके बाद उनके बड़े भाई की मौत हो गई। दरवाजा हटवाने के बाद जाकर वह पैदा हुए।
ग्रामीण कमला कांत मिश्र भी इसका समर्थन करते हैं। वह कहते हैं कि जिन्होंने दरवाजा लगवाया परिणाम बुरा हुआ। पर मनोविज्ञानी डा. पीयूष कान्त शर्मा इसे कोरे अंधविश्वास पर आधारित बताते हैं। उनका कहना है कि लम्बे समय तक अंधविश्वास का पालन परंपरा का रप ले लेता है।
Published on:
18 Sept 2017 05:59 pm
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