18 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

लोगों के सिर चढ़कर बोलता है इस बाहुबली का खौफ, कोई नहीं कर पाता इनका विरोध 

जानिए कैसे चलती है बाहुबली की सत्ता, कैसे बनता है समीकरण...

5 min read
Google source verification

image

Jyoti Mini

Dec 26, 2016

bahubali

bahubali

इलाहाबाद. उत्तर प्रदेश की सियासत में पूर्वांचल की बड़ी हिस्सेदारी है और जब चुनावी बात हो तो बिना पूर्वांचल के बाहुबल अपराधीकरण और धनबल के पूरी नहीं होती। राजनीतिक पार्टियां भले ही दावा करें कि दागी छवि के लोगों को टिकट नहीं देंगी। लेकिन विधानसभा की स्थिति देखें या पार्टियों के घोषित प्रत्यशियों की सूची उनका दावा ढ़ेर हो जाता है। सूबे की सियासत में बाहुबल किस कदर हावी है इसका अंदाज़ा सिर्फ इससे लगा लीजिये की प्रदेश का सबसे मजबूत मुलायम सिंह यादव का कुनबा टूटने की कगार पर आ गया।

परिवार में कलह की शुरुआत उस दिन हुई जब शिवपाल यादव ने गाजीपुर के बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी की पार्टी का सपा में विलय का ऐलान किया। इस फैसले से खफा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चाचा के खिलाफ बगावत का कदम बढ़ा दिया था। ऐसा ही एक नाम इलाहाबाद के बाहुबली नेता अतीक अहमद का भी है। अतीक निर्दल विधायक सपा अपना दल के प्रदेश अध्यक्ष होते हुए फिर सपा में पहुंचे और पार्टी से टिकट का भी जुगाड़ कर लिया। हालांकि इस बार अतीक को राजनितिक जिला बदर किया गया है। समाजवादी पार्टी ने कानपुर से प्रत्याशी बनाया है। ऐसे बड़ा सवाल यही है कि जिले की दर्जनभर सीटें छोड़कर सपा ने अतीक को कानपुर क्यों भेजा इसके पीछे उनकी छवि है या कानपुर के स्थानीय समीकरण।

टिकक घोषित होने के बाद एक बार फिर अतीक ने गुंडई की है। ऐसे में सवाल यह भी उठने लगा है कि क्या अखिलेश यादव अपनी छवि बचाने के लिए कड़ी कार्रवाई करेंगे या चाचा शिवपाल अतीक पर लगे इस आरोप की अनदेखी करेंगे। लेकिन अतीक का कहना है वो सिर्फ नेता जी को जानते हैं।

बाहुबली अतीक अहमद शहर पश्चिमी से पांच बार विधायक और फूलपुर से एक बार सांसद रहे हैं। शहर पश्चिमी से जब तक अतीक ने राजनीती की किसी ने उनके सामने सर उठाने की हिम्मत नहीं की और जिसने कोशिश की वो दुनिया से चला गया।लेकिन इन सबके बावजूद भी अतीक के चाहने वाले कभी कम नहीं हुए। साथ ही समय के साथ अतीक के नाम से जो खौफ था वो बढ़ता गया।

कभी माफिया अतीक से लेकर अतीक भाई तक के सफ़र में कभी पीछे मुड़ नही देखा । रेलवे की ठेकेदारी से लेकर रंगदारी तक अतीक के नाम पर ली जाने लगी। समय समय पर अपनी छवि को लेकर चर्चा भी सुर्खियों में रही एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि उनका निजी स्वभाव बेहद सरल है लेकिन उनका दूसरा चेहरा जिससे खौफ भी डरता है। अतीक अहमद पर पहला मुकदमा सत्रह साल की उम्र में हुआ जिसका सिलसिला आज तक नहीं रुका। अाकडों की माने तो आज भी अतीक पर 100 से भी ज्यादा मुकदमे हैं। अपने चाहने वालो को अतीक ने कभी निराश नहीं किया और दुश्मनों को कभी छोड़ा नहीं।

पिछले चुनाव में श्रावस्ती लोकसभा से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी बनते ही अतीक अपने बयान को लेकर चर्चा में आये थे । टिकट घोषित होते ही मीडिया के सवाल पर कहा था की श्रावस्ती की चौहद्दी घेर कर चुनाव लडूंगा कोई और प्रचार तक नहीं करेगा। अतीक के प्रचार में हर बार घोड़े खास होते हैं चाहे विधानसभा हो या लोक सभा हर चुनाव में सैकड़ों घुड़सवार प्रचार पर निकलते हैं। जानकार कहते हैं कि चुनाव के दरमियान अतीक का खौफ तो रहा लेकिन इन्हें जीत नहीं मिली ।

अतीक का राजनितिक सफरनामा
कहा जाता है की पूत के पांव पानले में दिख जाते है अतीक अहमद पर 1979 जब उनकी उम्र 20 बरस की भी नहीं थी तो हत्या का पहला मुकदमा दर्ज हुआ था। 1989 में शहर पश्चिमी से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में अतीक अहमद ने राजनीत में कदम रखा चुनाव में जीत हासिल की उस समय अतीक के खिलाफ हर कदम पर चाँद बाबा मैदान में थे। जिनकी चुनाव बाद शहर के चौराहे पर दिन दहाड़े हत्या कर दी गई थी। जिसका आरोप अतीक अहमद पर लगा। उसके बाद से इस शीट पर लोग टिकट लेने से ही कतराते रहे 1991 में अतीक यही से दुबारा निर्दल विधायक हुए।

1993 में तीसरी बार परचम लहराया 1996 में समाजवादी पार्टी से विधायक चुने गए 2002 में सोने लाल पटेल ने अपना दल से टिकट दिया और अतीक को प्रदेश अध्यक्ष बानाया ।2004 में फूलपुर से सपा से लोक सभा जीत कर संसद पहुंचे। 2004 में सांसद बनने के बाद पश्चिमी की खाली हुई जिस पर भाई असरफ को उम्मीदवार बनाया जिसमे असरफ को हार का सामना करना पड़ा।

विधायक बनने के दो महीने बाद राजू पाल की सरे राह गोलियों से भून कर हत्या कर दी गई। जानकारों के अनुसार जिले में दूसरी बार हाईप्रोफाइल हत्या कांड में ए के 47 का इस्तेमाल हुआ था। जिस अतीक का नाम लेने में लोगो में खौफ होता था। बसपा सरकार में उसके नाम के नगाड़े बजे और चकिया करेली सहित शहर के चौराहे पर मुनादी करायी गयी । 1995 में लखनऊ में चर्चित गेस्ट हॉउस कांड में मायावती के साथ हाथापाई में नाम आया ।1996 और 2002 में बसपा सरकार में जेल गए करोडो की सम्पत्ति सीज की गई। 2007 जुलाई में सांसद होते हुए अतीक को भगोड़ा घोषित किया गया और दीवारों पर स्केच लगाये गए। इसी साल अतीक अहमद को 20000 हजार का इनामी घोषित किया गया ।2009 लोकसभा चुनाव प्रतापगढ़ से अपनादल के टिकट पर मैदान में लेकिन चुनाव हार गए। 2014 में श्रावस्ती से फिर समाजवादी पार्टी ने चेहरा बनाया लेकिन संसद नहीं पहुंच सके ।

जिसने भी सर उठाया वो नहीं रहा
कहा जाता है की अपने समय में चाँद बाबा की हनक इस कदर थी उनके सामने से गुजरने में लोगो में दहशत होती थी । उस समय चाँद बाबा ही थे जिससे अतीक खौफ खाता था ।लेकिन बाबा की हत्या के बाद किसी ने सर उठने की जुर्रत नही की । और राजू पाल ने भी अतीक के शीट छोड़ने के बाद ही चुनाव लडे लेकिन वो भी विधान सभा तक नही पहुच पाए राजूपाल की हत्या के बाद से अतीक अहमद के बुरे दिन की शुरुवात हुई।

मायावती का सीधा हस्तक्षेप पूरे प्रकरण में रहा इलाहाबाद पंहुच कर मायावती ने राजनितिक सरगर्मियां बढ़ा दी थी। नयी नवेली दुलहन पूजा पाल जिसके हाथों की मेंहदी तक नहीं छूटी थी एवो सीधे अतीक के सामने थी। जानकारों की माने तो पूजा पाल ने जिस वख्त मंच से अपने मेंहदी वाले हाथों को जनता को दिखा कर सिर्फ रोती रही। लोगों की भीड़ और उसके सन्नाटे ने अतीक के राजनितिक रसूख को खत्म करने का मन बना लिया और तब से आज तक कोई भी राजनितिक पद नहीं जीत सके। अतीक पर हत्या हत्या के प्रयास अपहरण धमकी कब्जेदारी सहित सैकड़ों मुकदमे दर्ज हैं। राजूपाल हत्याकांड में सीबीआई की जाँच नए सिरे से शुरू है। बाहुबली अतीक जिसका नाम भी आदमी दबी जुबान लेता था। खौफ इस कदर हाबी था की उनके करेली स्थित आवास की तरफ से गुजरने वाला घूर कर उनके घर की तरफ नहीं देख सकता। आज उसी अतीक अहमद को जिले की किसी भी सीट पर जगह नही मिली और राजनितिक जिला बदर होना पड़ा ।

मदरसा कांड
इलाहाबाद का चर्चित मदरसा कांड जिसने पूरे प्रदेश को हिला कर रख दिया था। जिसकी गूंज इलाहाबद से लेकर लखनऊ और दिल्ली के गलियारों तक पहुंची। इस घटना के बाद अतीक अहमद से उनके करीबी और उनके कौम के लोग भी नाराज हो गए। इसका सबसे बड़ा खामियाजा यह रहा की उनके समुदाय के लोग भी उनके विरोध में उतरने लगे जो उनकी सबसे बड़ी ताकत थे।

मदरसा कांड में फिर अतीक के भाई असरफ का नाम आया। शहर के करेली क्षेत्र में रसूलपुर इलाके में चल रहे मदरसे में पढ़ने वाली तीन बच्चियों के साथ रेप की घटना सामने आई थी। इस प्रकरण में भी मायावती पीड़ित परिवार से मिलने इलाहाबाद आयी और राजनैतिक रंग दे गई। बाद मुलायम सिंग यादव के करीबी और प्रदेश सरकार में मंत्री रहे अहमद हसन भी इलाहाबाद पहुंचे पीड़ित परिवार को पांच पांच लाख के मुआवजे की रकम की पेशकस की जिसे परिवार ठुकरा दिया।

हालांकि इस मामले की जांच में असफर नहीं पाए गए लेकिन यह साफ़ था की दोषियों को बचाने का आरोप अतीक पर लगा। विधायक राजूपाल की हत्या के बाद मदरसा कांड सनसनी खेज वारदात थी और इसी के बाद राजनैतिक रूप से अतीक अपने ही लोगो का विश्वास खो दिया। राजूपाल पाल की हत्या के बाद से पश्चिमी सीट पर पूजापाल का ही कब्जा है।

ये भी पढ़ें

image