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हरिवंशराय बच्चन : संगम की माटी का अद्भुत रचनाकार , जिसने शब्दों की मधुशाला का कराया रसपान

उनके जन्मदिन पर उनका शहर उन्हें याद कर रहा

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Birthday special on Harivansh Rai Bachchan

हरिवंशराय बच्चन : संगम की माटी का अद्भुत रचनाकार , जिसने शब्दों की मधुशाला का कराया रसपान

प्रयागराज। संगम का शहर मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन का इस शहर से अटूट नाता रहा है। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश राय बच्चन की ये धरती कर्मभूमि रही है। इसी माटी में रचते बसते उन्होंने हिंदी साहित्य में अमर रचनाओं का सृजन किया। यहीं से विश्व भर में अपनी ख्याति अर्जित की । यहीं पूरब के आक्सफोर्ड में अध्यापन करने वाले हरिवंश राय बच्चन की तमाम यादें इस साहित्य की राजधानी से जुड़ी हुई है।

यहीं रची अमर रचना
हरिवंश राय बच्चन ने यहीं संघर्ष किया यहीं पर उन्होंने अपने बेटे के एक सफल राजनेता के रूप में देखा। साहित्यकार बच्चन साहब इसी शहर में आते जाते सदी के महानायक के पिता भी कहलाये। 1935 में मधुशाला जैसी अमर रचना को रच उन्होंने साहित्य जगत में अपना स्थान बना लिया था। मधुशाला के साथ उनकी दूसरी रचनाएं खूब मशहूर हो रही थी। बच्चन साहब की क्या भूलूं क्या याद करूं, बसेरे से दूर, सोपान जैसी अमर रचनाओं ने उन्हें प्रख्यात साहित्यकार के रूप में पहचान दे दी थी ।हरिवंश राय बच्चन के 112 में जन्मदिन पर उनका शहर उन्हें आज याद कर रहा है।हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर 1907 को पड़ोसी जिले प्रतापगढ़ के बाबू पट्टी गांव में हुआ था हरिवंश राय बच्चन कायस्थ परिवार से तालुकात रखते थे।


यहीं अजिताभ और अमिताभ का जन्म हुआ
हरिवंश राय बच्चन ने अपने शुरुआती पढ़ाई उर्दू में की पर आगे चलकर उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एमए किया। कई सालों तक विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में प्राध्यापक रहे बच्चन साहब ने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी के एक कवि पर शोध किया। इलाहाबाद में रहते हुए 1926 में हरिवंश राय बच्चन की शादी श्यामा बच्चन से हुई ।लेकिन 1936 में टीवी की बीमारी के चलते श्यामा बच्चन का निधन हो गया। 1947 में पंजाब की रहने वाली तेजी सूरी के साथ हरिवंश राय बच्चन की दूसरी शादी हुई। इलाहाबाद में अमिताभ बच्चन उनके भाई अजिताभ बच्चन का जन्म हुआ।

कहीं भी गये बच्चन साहब इलाहाबाद हमेशा साथ रहा
बच्चन परिवार के करीबी बाबा अभय अवस्थी बताते हैं कि बच्चन साहब का परिवार प्रयागराज के जीरो रोड पर शुरुआती दौर में रहता था। बच्चन साहब इस शहर को जीते थे यहां की फिजाओं ने उन्हें खुद से कभी अलग नहीं होने दिया । बच्चन साहब भले कहीं भी चले गए हो लेकिन यह शहर हमेशा उनमे बसा रहा। बाबा कहते हैं कि बच्चन साहब की कविताओं में दिखने वाली मस्ती मंच पर उनकी प्रखर बौद्धिकता का समावेश इसी शहर से हुआ ।बच्चन साहब बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे ।आज भी बच्चन साहब का साहित्य लोगों के लिए एक शानदार पाठ्य सामग्री के तौर पर है। बच्चन साहब ने 18 जनवरी 2003 को मुंबई में आखिरी सांस ली थी ।