
कल्पवास की कुटिया में काकी को ककहरा सिखा रहीं लॉडो
राजेश पटेल
प्रयागराज. कुंभ नगरी में पुण्य कमाने के साथ ही बेटियां शिक्षा की अलख जगा रही हैं। ये बेटियां कोई और नहीं बल्कि कल्पवास में दादी-बाबा, नानी-नाना और काका-काकी की सेवा के लिए कुटियां में जिम्मेदारी संभाल रहीं हैं। श्रद्धा, तृप्ति और प्रीति जैसी कई लॉडो ज्ञान की गंगा बहा रहीं है।
तीर्थराज प्रयाग में गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के मिलन स्थल पर कल्पवास का मेला वैसे तो पौष पूर्णिमा से शुरू हो रहा है। लेकिन, कल्पवासियों की कुटिया मंकर संक्रांति से ही गुलजार है। कुंभ में पुण्य की आस में पहुंची बेटियां काकी को ककहरा सिखाने में रुचि ले रही हैं। शिविर में शाम-सुबह भजन कीर्तन के साथ ही बुजुर्ग महिलाओं को क, ख, ग का अक्षर ज्ञान देकर पुण्य कमा रहीं। कुंभ मेले के सेक्टर-6 नागवासुकी गेट के बगल में मध्य प्रदेश के सीधी जिले का शिविर लगा है। शिविर में सीधी जिले के नौगवाधीर गांव की बुजुर्ग कुसुम और दुअसिया बताती हैं कि नातिन पढ़ाई कर रही है। अंगूठा लगाने पर नातिन नाराज होती थी। शिविर में ही पड़ोस बुजुर्ग सुमित्रा द्विवेदी की नातिन हस्ताक्षर सिखा रही थी। इसी तरह अलग-अलग कुटियां में दादी-बाबा की सेवा करने आयी सभी बेटियों ने साक्षर करने का संकल्प लिया है।
एक के बाद एक बेटियां आ रहीं आगे
बीए की पढ़ाई पूरी कर चुकी श्रद्धा द्विवेदी ने बताया कि दादी पढ़ी-लिखी नहीं हैं, अंगूठा लगाना अच्छा नहीं लगता था। शिविर में स्नान ध्यान और कीर्तन भजन के बाद खाली समय में हस्ताक्षर करने की प्रेक्टिस कराने लगे। दादी हस्ताक्षर करना सीख गईं तो पड़ोस में रहने वाली करीब एक दर्जन से ज्यादा लड़कियां ने सभी को ककहरना सीखने का संकल्प लेकर शुरू कर दिया। मकरसंक्रांति के बाद एक दूसरे के सहयोग से बुजुर्ग महिलाओं को ककहरा के अक्षर ज्ञान के साथ ही हस्ताक्षर करना सीखाती हैं। अब तक दर्जनों बुजुर्गों को हस्ताक्षर करना सिखा दिया है। शिविर में बेटियों की देखी सीखा पढ़ाने के लिए आस-पास के शिविरों में संख्या बढ़ रही है। इसके लिए बेटियों को न तो कोई एजनीजो और न ही सरकारी सहयोग दिया जा रहा है, ये बेटियां स्वयं के सोच से काकी को ककहरा सीखने का संकल्प लिया है।
संगम की रेती पर 6 लाख से अधिक कल्पवासी
संगम की रेती पर गंगा स्नान के लिए हर साल बड़ी संख्या में कल्पवासी पहुंचते हैं। इस बार कुंभ में करीबन 6 लाख से अधिक कल्पवासी हैं। अकेले मध्य प्रदेश के सीमावर्ती जिले रीवा, सीधी, सतना, सिंगरौली, शहडोल, अनूपुर, चित्रकूट आदि क्षेत्र से 50000 से अधिक कल्पवासी पूष पूर्णिमा से लेकर माघ पूणिमा तक कल्पवास करते हैं।
Updated on:
21 Jan 2019 06:14 pm
Published on:
21 Jan 2019 12:29 pm

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