प्रयागराज.
त्रिवेणी संगम की कुंभनगरी प्रयागराज में दारागंज घाट मार्ग पर देवी की देश में 52 शक्तिपीठों से एक शक्तिपीठ स्थापित है। इस शक्तिपीठ का नाम अलोपशंकरी है। क्यों कि यह ऐसा खास मंदिर है, जहां पर कोई मूर्ति नहीं रखी गई है। मंदिर के बीच एक चबूतरा बना हुआ है और उसके ऊपर एक झूला यानि पालना लगा रखा है। इस पालने को लाल कपड़े से ढका रखा जाता है। पालने के नीचे एक कुण्ड बना हुआ है। इस कुण्ड के जल को चमत्कारिक शक्तियों वाला माना जाता है।
मान्यता के अनुसार मां सती की कलाई इसी स्थान पर गिरी थीं। इसलिए यह प्रसिद्ध शक्ति पीठ है और इस कुंड के जल को चमत्कारिक शक्तियों वाला माना जाता है। आस्था के इस अनूठे मन्दिर में श्रद्धालु किसी प्रतिमा की नहीं, बल्कि झूले या पालने की ही पूजा करते हैं। अलोपी नामकरण के पीछे भी एक मान्यता है। बताया जाता है कि यहां शिवप्रिया सती के दाहिने हाथ का पंजा गिरकर अदृश्य या अलोप हो गया था, इसी वजह से इस शक्ति पीठ को अलोप शंकरी नाम दिया गया।
मान्यता है की यहां कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर मन्नत मांगने वाले भक्तों की हर कामना पूरी होती है और हाथ में धागा बंधे रहने तक अलोपी देवी उनकी रक्षा करती हैं। प्रयाग (इलाहाबाद) में तीन मंदिरों को मतांतर से शाक्तिपीठ माना जाता है और तीनों ही मंदिर प्रयाग शक्तिपीठ की शक्ति ‘ललिता’ के हैं। पहला मंदिर अक्षयवट है, जो किले के अन्दर स्थित है। दूसरा मंदिर ललिता देवी का दारागंज घाट मार्ग मीरापुर के निकट स्थित है और तीसरा मंदिर अलोपी माता का है। सुबह व शाम के समय शक्तिपीठ अलोपशंकरी के मंदिर में आरती का दृश्य मनमोहक होता है। श्रद्धालु यहां आकर सभी तरह के दु:ख-दर्द भूल जाते हैं। यहां लोग मन्नत का धागा बांधकर मंगलकामना करते हैं और देवी शक्ति उनकी रक्षा करती है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु आरती के समय मां शक्ति के आंगन में होते हैं, वे धन्य हो जाते हैं।