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इलाहाबाद पहुंचे महात्मा गांधी को स्टेशन के पास होटल में रुकना पड़ा था,जानिए क्या थी वजह

छह बार इलाहाबाद आए थे महात्मा गांधी, पांच बार आनंद भवन में रुके ,संगम में विसर्जन से पूर्व आनंद भवन के अहाते में ही रखा गया था अस्थिकलश

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anand bhawan

mhatma gandhi

प्रसून कुमार पांडेय

इलाहाबाद। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का जिक्र हो और इलाहाबाद का नाम न आए ऐसा नहीं हो सकता। गंगा—यमुना—सरस्वती के संगम की यह भूमि जितना ऐतिहासिक, धार्मिक और साहित्यिक कारणों के लिए ख्यात है उतना ही बड़ा इसका योगदान देश की आजादी के आंदोलन में भी रहा है। दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौके पर उन्हें दुनिया स्मरण कर रही है। ऐसे में संगम नगरी भी अपने बापू को याद कर रही है। जानकारों के मुताबिक बापू छह बार इलाहाबाद आए और इनमें से पांच बार आनंद भवन में रुके थे।

करीब चालीस साल तक आनंद भवन के चीफ केयरटेकर रहे मुंशी कन्हैयालाल के दामाद श्यामकृष्ण पांडेय बताते हैं कि बापू आखिरी बार आनंद भवन जून 1942 में आए थे। मुंशी कन्हैयालाल 1940 में आनंदभवन और स्वराज भवन के चीफ केयर टेकर बनाए गए और 44 साल तक यह जिम्मेदारी संभाली थी। इलाहाबाद के इतिहास के जानकार श्यामकृष्ण पांडेय कहते हैं, आजादी के आंदोलन में आनंद भवन बड़ा केंद्र रहा। इसके ठीक बगल स्थित स्वराज भवन का योगदान भी देश की आजादी में अविस्मरणीय है।

जानकारों के मुताबिक बापू छह बार इलाहाबाद आए और इनमें से पांच बार आनंद भवन में रुके थे। दो बार कांग्रेस की बैठकों के सिलसिले में तीन बार अन्य कारणों से आए थे। एक बार वे कमला नेहरू अस्पताल के उदघाटन के लिए भी इलाहाबाद आए थे। आजादी के आंदोलन की अगुवाई करने से पूर्व भी वे एक बार इलाहाबाद आए लेकिन तब स्टेशन के पास जानसेनगंज के पास किसी होटल में रुके और शहर घूमकर आगे चले गए थे।

इसलिए था गांधीजी से प्रयाग का खास रिश्ता
आज़ादी से पहले आनंद भवन कांग्रेस मुख्यालय था। गांधीजी दो बार पांच बार आनंद भवन आए थे। 1930 में नेहरू परिवार स्वराज भवन से आनंद भवन में रहने आ गया। इसके बाद से स्वराज भवन कांग्रेस का घोषित कार्यालय बन गया। 1942 के आंदोलन में ब्रिटिश सरकार ने स्वराज भवन को जब्त कर लिया और आजादी तक यह अंग्रेजों के कब्जे में ही रहा।


इसी शहर में बना था आंदोलन का मसौदा
जुलाई 1942 में वर्धा में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हुई थी। इसके ठीक पहले इलाहाबाद में एक बैठक हुई, जिसमें भारत छोड़ो आंदोलन का मसौदा बना और उस पर चर्चा हुई। इसके बाद जुलाई में वर्धा में हुई बैठक में इस पर मुहर लगी। 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस की बैठक बम्बई के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक में हुई। गांधीजी के भारत छोड़ो प्रस्ताव को कांग्रेस कार्यसमिति ने कुछ संशोधनों के बाद स्वीकार लिया और नौ अगस्त से देशव्यापी आंदोलन की शुरुआत हुई।

आनंद भवन की छत से बापू का संबोधन
बापू का इलाहाबाद से रिश्ता बहुत प्रगाढ़ था। जून 1942 में जब आखिरी बार वे आनंद भवन आए थे तो उनसे मिलने और उनके दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग आनंद भवन पहुंच गए। भीड़ ज्यादा होने से सबसे व्यक्तिगत मुलाकात संभव नहीं थी तो बापू ने आनंद भवन की छत से लोगों को संबोधित किया था।

कमरे में संरक्षित है गांधीजी की यादें
पांडेय बताते हैं कि गांधीजी के लिए आनंद भवन में एक कमर सुरक्षित रहा। जो उनके हिसाब से बना था। उसमें उनका पलंग, पूजा के बर्तन, कपड़े, कुर्सी, मेज, चरखा, तीन बंदरों का छोटो स्टैच्यू आज भी सुरक्षित हैं।आज भी लाखों लोगो के लिए गाँधी जी का विचार यहाँ जिन्दा है ।

गांधी जी के अस्थि कलश का विसर्जन
30 जनवरी 1948 को गांधी जी की दिल्ली के बिड़ला भवन में हत्या कर दी गई। उनके अंतिम संस्कार के बाद उनकी अस्थियां देशभर में प्रवाहित करने के लिए भेजी गईं। उनका अस्थि कलश इलाहाबाद भी लाया गया। यहां संगम में विसर्जनसे पूर्व अस्थिकलश आनंद भवन के आहाते में रखा गया। उनको श्रदांजलि देने के लिए पूरा शहर उमड़ पड़ा था। आनंद भवन में आज भी वह गाड़ी देखी जा सकती है जिससे अस्थि कलश को विसर्जन के लिए संगम तक ले जाया गया था।