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ओमपुरी का संगमनगरी से था गहरा कनेक्शन, जानिए अनकही बातें 

शानदार कलाकार और बेबाक वक्त की यादों को पत्रिका से किया साझा 

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Jyoti Mini

Jan 06, 2017

om puri,

om puri,

प्रसून पाण्डेय
इलाहाबाद. सिल्वर स्क्रीन पर अपने बेहतरीन अभिनय से हर किरदार को अपना अंदाज देकर देश और दुनिया के कला प्रेमियों के दिल में बसने वाले ओम पूरी साहब सब को स्तब्ध कर अलविदा कह गए। भले ही उनका नीजी जीवन अलग-अलग कारणों से चर्चा में रहा हो। लेकिन इन सबके बावजूद उन्होंने अपने किरदार और अभिनय से कोई समझौता नहीं किया। ओम पूरी हर मंच पर वो अपनी विधा का सर्वोतम दे गये।

आर्टिस्टिक फिल्मो में महारत रखने वाले अभिनेता ने दर्शकों को अपने हर किरदार पर सोचने को मजबूर कर दिया। फिल्म जगत के साथ रंगकर्म के मंच से एक बड़ा कलाकार चला गया। वो कलाकार जो कभी अन्ना के आन्दोलन में गाँधी मैदान पर तिरंगा लेकर मंच पर होता था। तो कभी अपनी माफ़ी मागने शहीद जवान के घर पंहुचा।

फिल्म कलाकार के साथ पूरी साहब को लोग बेबाक अंदाज के लिये भी याद रखेंगे। ओमपूरी की मौत की खबर जैसे ही लोगों तक आज सुबह पंहुची तो सबके जेहन में उनका हर किरदार अभिनय करने लगा। हर किसी के पास उनके फिल्मो की कहानियां थी। उनके बातों का जिक्र और उनके डायलाग से लेकर उनके बेबाक अंदाज के किस्से थे। हर शहर की तरह इलाहाबाद के भी हिस्से में भी उनकी यादें हैं ।फ़िल्मो में किरदार और शूटिंग के आलावा भी ओम पूरी आते थे। और कई-कई दिन रुकते थे। शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी अभिलाष नारायण जो की ओम पूरी की फिल्म में किरदार निभाए थे। उन्होंने पत्रिका से ओम पूरी की यादे साझा की ।

रंगकर्मी और कला प्रेमी के लिये ओम पूरी के जाने से कला और अभिनय का पन्ना अधूरा रह गया। शायद अभी फिल्मों के किरदार के ही जरिये बहुत कुछ सिखाने को था उनके पास। कलाकार अभिनय कर सकता है लेकिन अभिनय में कला को उतरना ओम पूरी की खूबी थी। इलाहाबाद के वरिष्ठ रंगकर्मी अभिलाष नारायण ने पत्रिका से विशेष बातचीत में कहा की श्याम बेनेगल साहब की परखी नजर ने ड्रामा स्कूल के मंच से जो कलाकार चुना था वो उनके साथ फिल्म जगत के लिये नायाब साबित हुआ।

उनकी कमी हमेशा कला के मंच को खलेगी। अभिलाष नारायणी बताया की ओम पूरी साहब इलाहाबाद आते थे। उनकी बुआ हीरा चढ्ढा इलाहाबाद के आकाशवाणी में प्रोग्राम आफिसर थी और हीरा चढ्ढा नेशनल स्कूल आफ ड्रामा के पहले बैच की स्टूडेंट थी। कला और अभिनय पूरी साहब के खानदान को विरासत में मिली थी। लम्बे समय तक हीरा जी इलाहाबाद में कार्यारत थीं। ओम पूरी साहब का उनके पास अक्सर आना होता था। ओम पूरी बिना किसी प्रचार-प्रसार के आते थे संगम नगरी में रुकते और चाले जाते थे ।

अभिलाष नारायण कहते हैं कि पूरी साहब को इस शहर में सुकून मिलता था। मुंबई की चकाचौंध से दूर प्रयाग में छुट्टी बिताना उन्हें पसंद था। अपने कैरियर के सबसे अच्छे दिनों में जब ज्यादातर हीरो अपनी छुट्टिया विदेशो में बिताते थे । उन दिनों पूरी साहब इस शहर में होते थे। अभिलाष नारायण कहते ही उनके साथ मेरी दो लम्बी मुलाक़ात रही पहली उनकी बुआ के घर पर और दूसरी इलाहाबाद में रोड टू संगम फिलम की शूटिंग के दौरान कहते है कि फिल्म में हमारा किरदार अलग अलग था ।लेकिन उस फिल्म का मै भी हिस्सा रहा ।

बतादें की रोड टू संगम की कहानी एक मुस्लिम मैकेनिक हशमत उल्लाह के किरदार के आस पास घूमती है जिसके पास उस ट्रक का इंजन रिपेयर करने के लिए आता है जिसमें कभी महात्मा गांधी की अस्थियों को इलाहाबाद के संगम पर विसर्जित करने के लिये लायी गई थी। उस ट्रक के इंजन की रिपेयरिंग करने का जिम्मा हशमत को मिलता है। लेकिन उसके इस काम का विरोध में कुछ मुस्लिम नेता खड़े होते हैं और वो उस इंजन की मरम्मत का विरोध करते हैं।

अब हशमत उल्लाह के सामने सबसे बड़ी मुश्किल है कि क्या वो उस इंजन की मरम्मत करे जिससे किसी हिंदू की अस्थियों को लाया गया था या अपनी क़ौम का साथ देते हुए उस इंजन की मरम्मत करने से इनकार कर दे। लेकिन हशमत ने अपने लोगो की चोरी से इंजन रिपेयरिंग के लिये रात में काम किया और अस्थिया रवाना हुई। आज भी वो ट्रक इलाहाबाद के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित रखी है। फिल्म में दर्शाए गए उस दृश्य को जिसमे अस्थिया संगम जाती है। उस दौरान उसी ट्रक का स्र्क्रिन पर दर्शाया गया है।

आज ओम पूरी साहब के ना होने पर इलाहबाद और यहां के रंगकर्मी उन्हें उनके अभिनय और कला के किरदार और दमदार आवाज को याद कर रहे हैं। उन्हें याद करके कहते हैं कि पूरी साहब फिल्मो में अभिनेता के साथ कला और मंच से उस शिक्षक की तरह थे। जिन्होंने अभिनय से लोगों को जोड़ने की कला सिखाई। फिल्म रोड टू संगम की पूरी सूटिंग इलाहाबाद में हुई थी और देश के आलावा इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में कई एवार्ड अपने नाम किये।

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