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नवरात्र: प्रयागराज के इस शक्तिपीठ में बिना मूर्ति लकड़ी के पालने की होती है पूजा

संगम नगरी प्रयागराज में शक्तिपीठ अलोपी देवी मंदिर का नवरात्र के दिनों में विशेष महत्व होता है। यहां पूरे नौ दिन श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। मान्यता है कि अलोपी देवी अदृश्य रूप में लकड़ी के पालने में विराजमान हैं। यहां उनके अदृश्य स्वरूप की पूजा की जाती है।

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Prayagraj News: शक्तिपीठों में एक अलोपी देवी मंदिर प्रयागराज के अलोपीबाग इलाके में स्थापित है। यहां दूर दराज से नवरात्र के समय लोग अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए आते हैं। मान्यता है कि रक्षासूत्र बांधने पर लोगों की इच्छाएं पूरी होती हैं। नवरात्र के दूसरे दिन सोमवार को भी लोग पूजा पाठ के लिए जुटे रहे। श्रद्धालुओं की आस्था के आगे पुलिस-प्रशासन के पसीने छूट रहे थे। भीड़ को देखते हुए महिला और पुरुष की अलग-अलग कतार लगाई गई थी।

लकड़ी के पालने की होती है पूजा
अलोपी देवी मंदिर में कोई मूर्ति स्थापित नहीं है। यहां सिर्फ लकड़ी के पालने की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि इसी पालने पर माता अदृश्य रूप से विराजमान हैं। उन्हीं के नाम पर मोहल्ले का नाम भी अलोपी बाग पड़ा है। संगम से छह किलोमीटर दूर इस मंदिर में साल भर लोगों की भीड़ रहती है लेकिन नवरात्र के दिनों में संख्या बढ़ जाती है।

सती के दाहिने हाथ का गिरा था पंजा
पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने जब माता सती के शरीर के टुकड़े किए तो प्रयागराज में इसी स्थान पर दाहिने हाथ का पंजा कुंड में गिरकर अदृश्य हो गया था। इसी वजह से देवी मंदिर की स्थापना हुई। प्रतीक के तौर पर पालना रखा गया है।

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