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शारीरिक-मानसिक ही नहीं, रोगों के कारण भी हो सकती है डिसेबिलिटी

लिव वैल : गर्भावस्था में स्क्रीनिंग के दौरान विकृति की पहचान कर उठा सकते हैं बचाव के कदम।

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Pawan Kumar Rana

Dec 02, 2017

Restricted pregnancy after sterilization 600 sterilization fails in

Restricted pregnancy after sterilization 600 sterilization fails in

भारत में डिसेबल लोगों की संख्या करीब 2 करोड़ से अधिक है। २011 की जनगणना के अनुसार देश में 2.21 फीसदी लोग दिव्यांग हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार विश्व में 15.3 प्रतिशत आबादी इस समस्या से जूझ रही है। इनमें सबसे अधिक चलने-फिरने में समस्या वाले लोग हैं। भारत में करीब 20 फीसदी को मूवमेंट जबकि 19 फीसदी को सुनने में समस्या है। भारत में 29 फीसदी दिव्यांगजन को दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। विशेषज्ञों की मानें तो सावधानी बरतकर इससे बचाव संभव है। हर वर्ष 3 दिसंबर को इंटरनेशनल डे ऑफ़ पर्सन्स विद डिसेबिलिटी मनाते हैं। पत्रिका टीवी के ‘हैलो डॉक्टर’ शो में इसी विषय पर विशेषज्ञों से हुई बातचीत के प्रमुख अंश...

डिसेबिलिटी के प्रकार
फिजिकल: रीढ़ की हड्डी में कोई तकलीफ होने से शिशु में जन्मजात शारीरिक विकृति होना।
सेरेब्रल पाल्सी: शिशु का शरीर पर नियंत्रण न रहना।
हियरिंग: शिशु सुनेगा नहीं तो बोल नहीं पाएगा। वह प्रतिक्रिया न दे तो समझें कि नहीं सुन सकता।
डाउन सिंड्रोम: क्रोमोसोम्स (गुणसूत्र) में गड़बड़ी से शिशु मानसिक रूप से कमजोर होता है।
कलर ब्लाइंडनेस: जन्म के बाद रंगों को न पहचान पाना।
स्टैमरिंग: जन्म के बाद शब्दों का उच्चारण सही से न कर पाना।

नई जिंदगी
किसी हादसे या अन्य कारण से पैर कट गया है तो जयपुर फुट (प्रॉस्थेसिस) से जिंदगी नए कदम भर सकती है। रबर से बने इस फुट को लगाने के बाद रोगी सामान्य व्यक्ति की तरह चल-फिर सकता है। इसकी मदद से व्यक्ति खेतीबाड़ी का काम करने के साथ साइकिल भी चला सकता है। इस प्रॉस्थेसिस की उम्र लगभग दो से तीन साल होती है।

रोगों का खतरा
डिसेबिलिटी सिर्फ शारीरिक-मानसिक परेशानी ही नहीं है। कुछ रोग जैसे डाउन सिंड्रोम, मल्टीपल स्क्लेरोसिस और सेरेब्रल पाल्सी भी एक तरह की डिसेबिलिटी है। ऐसे रोगी खुद से कुछ भी करने में सक्षम नहीं होते। इनकी अधिक देखभाल जरूरी है।

प्रेग्नेंसी केयर
जन्म लेने वाला शिशु हष्ट-पुष्ट हो इसके लिए गर्भवती को सेहत का खास खयाल रखना चाहिए। डाइट में पोषक तत्त्वों से युक्त चीजें खाएं और आयोडीन की मात्रा लेते रहें। वर्ना इसकी कमी से बच्चे में थायरॉइड हार्मोन का असंतुलन हो सकता है। महिला में खून की कमी से शिशु का वजन कम हो सकता है। विटामिन-बी कॉप्लेक्स की कमी से आंखों की नसें कमजोर हो सकती हैं।
बचाव : गर्भस्थ शिशु में कुछ विकृतियां ऐसी होती हैं जिन्हें गर्भावस्था में ही पहचानकर उनकी आशंका को कम कर सकते हैं। इसके लिए महिला का खानपान और दिनचर्या सही होनी चाहिए।

आधुनिकता
किसी भी तरह की डिसेबिलिटी को पूरी तरह से खत्म करना चुनौतीपूर्ण है। लेकिन मेडिकल साइंस के जरिए व्यक्तिके जीवन में होने वाली परेशानियों को कम कर सकते हैं। पोलियो या किसी अन्य कारण से शरीर के किसी भाग की मांशपेशी कमजोरी है तो एक्सरसाइज, थैरेपी व उपकरणों की मदद से उसे मजबूत बनाकर काम करने लायक बना सकते हैं। ऐसे 10-20 फीसदी मामलों में राहत मिलती है।

02 करोड़ से अधिक है भारत में डिसेबल लोगों की संख्या।

500 में से एक बच्चे को किसी न किसी वजह से होती शारीरिक दिक्कत जो भविष्य में बनती डिसेबिलिटी का कारण।
20% लोग सडक़ या अन्य तरह के हादसों के शिकार होने से होते डिसेबल।

हैलो डॉक्टर एक्सपर्ट टीम
डॉ. अशोक गुप्ता, शिशु रोग विशेषज्ञ, जेके लोन अस्पताल
डॉ. अनिल जैन, रिहैबिलिटेशन एक्सपर्ट, संतोकबा दुर्लभजी हॉस्पिटल