
15 कारीगरों ने बनाई 30 क्विंटल अष्टधातु की पांच प्रतिमा
दिनेश यदु @ रायपुर. देश में प्राचीन समय से ही देवस्थलों में उर्जा का मुख्य स्रोत वहां स्थापित अष्टधातु की मूर्तियां (Ashtadhatu Sculptures) रही हैं। ज्योतिषा शास्त्र (astrology) के मुताबिक हर धातु में ऊर्जा होती है। वास्तविक अष्टधातु सभी आठ दिव्य धातुओं का शक्तिशाली संयोजन माना जाता है। राजधानी से लगे निमोरा में मूर्तिकार पीलूाराम साहू (Sculptor Peeluram Sahu in Nimora) ने अपने 14 साथियों के साथ अष्टधातु की प्रतिमाएं बनाई हैं। उन्होंने पांच मूर्तियों का निर्माण किया है, जिसमें 4 फीट के गणेश, 5 फीट की मां दुर्गा, 4-4 फीट के राधा-कृष्ण और 3 फीट की काल भैरव की प्रतिमा है। वे बताते हैं कि इसमें 30 क्विंटल अष्टधातु लगा है। इसके साथ 3 क्विंटल मधुमक्खी का मोम, 7 ट्रक जलाऊ लकड़ी और 10 क्विंटल कोयला का उपयोग किया गया है।
हवा-तूफान का सामना
साहू ने बताया कि प्रतिमा के निर्माण करते समय कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। एक बार में सिर्फ दो क्विंटल धातु को गलाते हैं जिसके लिए हम शाम चार बजे से भट्टी जलाते थे। धातु के गलने के बाद रात 3 बजे धातु को सांचे में डाला करते थे। इस दौरान हमें कई बार तूफान की मार झेलनी पड़ती थी। हमें डर लगा रहता कि कहीं भट्टी बुझ ना जाए।
सोना-चांदी समेत इन धातुओं का इस्तेमाल
पीलूराम ने बताया कि शास्त्रों में अष्टधातु से निर्मित कोई भी वस्तु हो उसका एक अलग ही महत्त्व होता है। इसमें सोना, चांदी, तांबा, रांगा, जस्ता, पीतल, लोहा व कांसा मिलाकार आग की भट्टी में गलाया जाता है। प्रतिमा के अलग-अलग अंग बनाने के बाद सभी को जोड़ते हैं।
कौन सी प्रतिमा कहां जाएगी
गणेशजी- आरंग के पास नवागांव स्थित पुराना शिव मंदिर। काल भैरव - भाटापारा के पास मां दुर्गा, राधा-कृष्ण - नवा रायपुर के बेन्द्री स्थित मंदिर।
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Published on:
17 May 2022 09:20 am
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