10 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

profile_icon

प्रोफाइल

कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व उप कुलसचिव और लिपिक को 4 साल की सजा

कृषि विवि के तत्कालीन उप कुलसचिव और लिपिक को विशेष कोर्ट ने 5 वर्ष की सजा और 10 हजार रुपए से दंडित किया है

2 min read
Google source verification
agriculture university

कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व उप कुलसचिव और लिपिक को 4 साल की सजा

रायपुर. इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के तत्कालीन उपकुलसचिव एमके गढ़ेवाल और लिपिक उपेन्द्रमणी उपाध्याय को विशेष कोर्ट ने 5 वर्ष की सजा और 10 हजार रुपए के अर्थदंड़ से दंडित किया है। दोनों ही आरोपियों को एसीबी ने ४० हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा था।

READ MORE: फोटो गैलरी : रात के अंधेरे में ऐसा क्या हुआ कि साढ़े 7 घंटे थमी रही 45 ट्रेनों की रफ्तार देखिए तस्वीर...

विशेष न्यायाधीश ( भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) राजेन्द्र कुमार वर्मा ने बुधवार को इसका फैसला सुनाया। विशेष लोक अभियोजक योगेन्द्र ताम्रकार ने बताया कि पामगढ ़निवासी चंद्रशेखर खरे कृषि विज्ञान केंद्र जांजगीर-चांपा में प्रक्षेत्र प्रबंधक के पद पर तैनात थे। यहां तैनाती से पहले उनका

READ MORE: विधानसभा चुनाव तैयारी की तेज हुई आंच, कोई मांग रहा मुफ्त में स्कूटी तो कोई सिर पर गोदवा रहा प्रत्याशी के नाम का टैटू

चयन वरिष्ठ अनुसंधान अध्येता और बाद में ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी के पद पर हुआ था। प्रक्षेत्र प्रबंधक बन जाने के बाद खरे ने कृषि विस्तार अधिकारी के पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन विभाग ने उसे स्वीकार नहीं किया था। इस बीच उन्होंने जांजगीर-चांपा की तैनाती स्वीकार कर ली। दो पदों पर एक साथ तैनाती को गलत बताकर कृषि विश्वविद्यालय के उपकुलसचिव और लिपिक ने उनसे ३ लाख रुपए की रिश्वत मांगी थी।

READ MORE: सड़क हादसे में एसईसीएल के असिस्टेंट मैनेजर की दर्दनाक मौत, तमाशबीन बने रहे अधिकारी और पड़ा रहा शव

लगातार दवाब देने पर चंद्रशेखर ने एसीबी से शिकायत की। मामले की जांच करने के बाद योजनाबध्द तरीके से टीम ने १ मार्च २०१६ को रकम के साथ चंद्रशेखर को भेजा। रिश्वत लेते ही दोनों को ४० हजार रुपए रिश्वत की रकम के साथ पकड़ लिया गया। प्रक्षेत्र प्रबंधक बन जाने के बाद खरे ने कृषि विस्तार अधिकारी के पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन विभाग ने उसे स्वीकार नहीं किया था।