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देसवासीमन ल अजादी के कीमत समझे बर परही

हमर नवा पीढ़ी के लइकामन तो अंगरेजी-बिदेसी संस्करीति के जम्मो बुराईमन ल हाथों-हाथ लेवत हें। गुलामी कभु रिहिस, अब नइए, आगू नइ होही ए कहिना गलत हे। हमर समाज अउ देस म गुलामी बिना रुके चलत हे। हमरमन के मन म धीरज नइए। हमन पिछल्लगु हन।

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देसवासीमन ल अजादी के कीमत समझे बर परही

देसवासीमन ल अजादी के कीमत समझे बर परही

बिहनिया-बिहनिया चउंरा म बइठे, हाथ म अखबार धरे जुन्ना गुरुजी के मन म किसम-किसम के बिचार उमड़त-घुमड़त रिहिस। 7५ बछर पहिली गुलामी के सींगमन ल अजादी डहर मोड़ दे गे हे। वो सींगमन ल फेर सीधा करके आ बइला मोला मार! काहत हावंय। देसभर म सरकारी जिनिसमन ल अरबपति-खरबपतिमन ल बेचे ले तो इही लागथे। फेर, हमर नेतामन तो अपनआप ल बेचे म कोनो सरम नइ करत हें। ‘जेती बम, वोती हम’ के रद्दा म चलत हें। सत्ता मिले बर चाही, बैंक बैलेंस बाढ़े बर चाही, मान-सम्मान जाए तेल ले बर। जेन जनता ह वोट देके चुनई जितवाय हे, तेन ल ठेंगा। जेन पारटी ह चुनई लड़े बर टिकट दिस, वोला राम-राम। अपना काम बनता- चूल्हा म जाए जनता। कभु ईमान-धरम रिहिस, लाज-सरम लागय। अब तो बाप बडक़ा न भइय्या, सबले बडक़ा रुपइय्या के जमाना हे। जनतंत्र म तंत्र ह हावी होवत हे। महंगई, बेरोजगारी, गरीबी ले मरत जनता के कहुं सुनवाई नइए। अवाज उठइयामन ऊपर तंत्र के लउठी उठत हे। लोकतंत्र ह राजसाही कस जनावत हे। राजा के हुकुम के बिना पत्ता नइ हालय-डोलय कस किस्सा होवत हे।

गुरुजी सोचे लगिस। हमर नवा पीढ़ी के लइकामन तो अंगरेजी-बिदेसी संस्करीति के जम्मो बुराईमन ल हाथों-हाथ लेवत हें। गुलामी कभु रिहिस, अब नइए, आगू नइ होही ए कहिना गलत हे। हमर समाज अउ देस म गुलामी बिना रुके चलत हे। हमरमन के मन म धीरज नइए। हमन पिछल्लगू हन। एकदमेच बेचैन मन के हन। हमन ल चैन कभु मिलेच नइ सकय। तेकर सेती गुलामी ह नियति बन गे हे। कभु राजा-महाराजमन के गुलामी, त कभु अंगरेजमन के। अंगरेजमन चल दिन, फेर हमन आजो अंगरेजमन के बोली-भासा, खान-पान, रहन-सहन, पहनई-ओढ़ई, तीज-तिहार अउ संस्करीति के गुलाम बनेच हन। जूठा खाय के आदत कब जाही? दूसर के फेंके जिनिस ल उठाय बर कब बंद करबोन? परिवार टूटे के पीरा (दंस) बुड़ती (पस्चिम) वालेमन भोगत हें, अउ हमन अपन संयुक्त परिवार ल तोड़े बर मरे जावत हन। वोमन हमर आध्यात्म, योग ल अपनावत हावंय, हमन हन के वोकरमन से नंग-धड़ंग संस्करीति ल अपनाय बर उतारू हंन।
गुरुजी मनेमन गुनत हे। चीन ह अपन सस्ता जिनिसमन ल हमर देस म खपावत हे। सीमा म उधम मचावत हे। अंगरेजमन घलो बेपार करे बर आए रिहिन अउ हमन ल दू सौ बछर ले गुलाम बना के रखिन। अहसान मानव देस बर जान देवइया करांतिकारीमन के, अजादी बर सहीद होय देसभक्तमन के, ‘अंगरेजों भारत छोड़ो’ कहइया महात्मा गांधी अउ वोकर संग देवइया देसवासीमन के, जेकरमन के कुरबानी, बलिदान, तियाग अउ मेहनत के बलबूते आज हमन अजाद हन। फेर, निजीकरन करके फेर गुलामी के नेंव तो नइ देवत हंन? ए बारे म देसवासीमन ल सोचे बर परही। फेर, अइसन होवत नइ दिखई देवत हे, त अउ का-कहिबे।