
यह कैसा अधिकार: राज्य संपादक राजेश लाहोटी
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राजेश लाहोटी @ कोरोनाकाल के बाद आर्थिक कठिनाइयों का दौर चल रहा है। विशेष तौर पर दिहाड़ी मजदूर, अशासकीय कर्मचारी और दैनिक वेतनभोगी को आर्थिक असुरक्षा से दो-चार होना पड़ रहा है। इसका सबसे बड़ा असर उनके बच्चों की शिक्षा पर पड़ा है। शासकीय स्कूल भले ही मुफ्त शिक्षा दे रहे हों, परन्तु घर चलाने की जुगाड़ के चलते इस वर्ग के लोगों ने अपने बच्चों को स्कूल शिक्षा से अब तक वंचित रखा हुआ है। अधिकांश बच्चे मजदूरी, घरेलु कामकाज, खेती और फल-सब्जियां बेचकर अपना गुजारा करने को विवश हैं। इसमें बालिकाओं की स्थिति और भी दयनीय है। ग्रामीण अंचल में तो हालात और भी बिगड़े हुए हैं। इसके कारणों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि निजी स्कूल गरीब वर्ग के लिए शिक्षा के अधिकार के तहत अनिवार्य मुफ्त शिक्षा की जो सरकार की योजनाएं हैं, उसके प्रति पूरी तरह से अरुचि दिखा रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? सवाल जब उठता है तो हम सीधे निजी स्कूलों, उनकी भारी भरकम फीस और तामझाम को ही जिम्मेदार ठहराने लगते हैं। उनके साथ लूटखसौट टाइप का शब्द भी जोड़ देते हैं। लेकिन यहां हालात अलग हैं। जब सरकार ने योजना शुरू की तो यह नहीं देखा कि यह चलेगी कैसे? नतीजतन योजना केवल योजना बनकर ही रह गई और उसके दुष्परिणाम स्कूल और बच्चे दोनों ही भुगत रहे हैं।
ऐसा ही एक उदाहरण राइट टू एजुकेशन का देखिए। वर्ष 2019-20 में गरीब वर्ग के बच्चों को अनिवार्य मुफ्त शिक्षा योजना के तहत शासन ने निजी स्कूलों में 25 फीसदी कोटा के तहत दाखिला तो करवा दिया, परन्तु उनकी फीस का भुगतान आज तक नहीं किया। कभी सत्यापन के नाम पर तो कभी फंड की कमी का हवाला देकर स्कूलों को भुगतान ही नहीं किया। इसका असर गांव-कस्बों के छोटे-छोटे निजी स्कूलों पर पड़ा। वे बंद हो गए। गांव-कस्बों के बच्चे अब मेहनत मजदूरी में लग गए हैं। कुछ पालकों ने अपने स्तर पर फीस का जुगाड़ करने की कोशिश की तो वे कर्ज में दब गए।आखिरकार उन्होंने भी अपने बच्चों को काम पर लगा दिया। ऐसा नहीं है कि यह सब अफसरों के संज्ञान में नहीं है, लेकिन अफसरों ने आंकड़ों के जाल में सरकार को उलझा रखा है और सरकार आज तक बच्चों को स्कूल लाने का कोई ठोस उपाय नहीं कर पाई है। छोटे स्कूलों के लिए कोई प्रोत्साहन योजना के बजाय सरकार उनसे लॉकडाउन के दौरान भी टैक्स के रूप में राजस्व की नियमित वसूली करती रही। नतीजा, स्कूलों पर आर्थिक बोझ बढ़ता गया। वो फीस बढ़ाते गए और बच्चे स्कूल छोड़ते गए।
शिक्षाविद् का भी कहना है कि हालात अब भी ठीक हो सकते हैं अगर सरकार एक ठोस प्लान लेकर आए। शैक्षणिक संस्थानों को प्रोत्साहन दे। बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने की व्यवस्था करे। समस्या को समझते हुए उसकी जड़ में जाने की कोशिश करे। जिस तरह सरकार का काम है समाज के हर तबके को अपने साथ लेकर चलने का, ठीक उसी तरह अपने सिस्टम को भी उनके अनुरूप बदलना होगा। राइट टू एजुकेशन योजना को पूर्ण समर्पित भाव से लागू कराने पर जोर देना चाहिए। यह योजना अगर लड़खड़ाती है तो इससे बड़े और नामी स्कूलों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है, बल्कि उनकी तो मंशा ही होती है कि ऐसी योजनाएं ना आएं जिससे उन्हें कोई फायदा ना हो। असर होता है छोटे स्कूलों पर। ग्रामीण परिवेश में जी रहे लोगों पर। शहरों के दम पर व्यवस्था नहीं चलती है। यह समझना बेहद जरुरी है। इसलिए ग्रामीण गरीब बच्चों को शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं रखना चाहिेए।
Published on:
25 Feb 2023 02:44 pm
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