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Bageshwar Dham: जब बागेश्वर धाम के महाराज को हनुमान जी ने दिव्य रूप में दिए दर्शन, पढ़िए पूरी कहानी…

Bageshwar Dham: रायपुर में (Bageshwar Dham Sarkar Katha In Raipur) बागेश्वर धाम सरकार की कथा सुनने के लिए बड़ी भीड़ उमड़ रही है। गुढ़ियारी में फिर से 20 और 21 जनवरी को दिव्य दरबार लगेगा। Bageshwar Dham। Dhirendra Krishna Shastri News । Dhirendra Krishna Shastri Bageshwar Dham । Bageshwar Dham Divya Darbar

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Bageshwar Dham Sarkar Katha In Raipur

Bageshwar Dham Sarkar Katha In Raipur

Bageshwar Dham: बागेश्वर धाम सरकार (Bageshwar Dham Sarkar) यानी आचार्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (Pt. Dhirendra Krishna Shastri) गुढ़ियारी के दही हांडी लूट मैदान में श्रीरामकथा कह रहे हैं। बुधवार को कथा के दौरान उन्होंने चौंकाने वाली बात कही। उन्होंने बताया, बागेश्वर धाम हनुमान की सेवा के लिए हम भजन-भंडारे का संकल्प तो ले लेते थे, लेकिन उधार की चिंता भी सताती थी एक बार ऐसा ही धार्मिक आयोजन करवाया, जिसके चलते हम पर 3 लाख रुपए का कर्ज चढ़ गया। इस स्थिति में भी 40 ब्राह्मणों को दक्षिणा देते हुए एक और बड़े अनुष्ठान का संकल्प ले लिया। संकल्प तो ले लिया था पर मन बेचैन था।

आखिर सारी व्यवस्थाएं कैसे होंगी? हम परेशान होकर धाम की ओर ही जा रहे थे कि एक भयानक गर्जना हुई। आवाज आई कि मैं बागेश्वर धाम हनुमान हूं। आचार्य शास्त्री के दावे के मुताबिक, इसी दौरान भगवान ने दिव्य रूप में दर्शन दिए। उन्होंने बताया कि इसके अगले दिन एक व्यक्ति काला बैग लेकर आया। उसने कुछ नहीं कहा। बैग रखकर चला गया। उस बैग में इतनी रकम थी कि सारा कर्ज भी उतर गया और जिस अनुष्ठान का संकल्प लिया था, वह भी सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। इसी तरह जीवन में जब कभी परेशानी आती है, हम हनुमान को याद करते हैं। आप भी करिए। वे जरूर आपकी सहायता करेंगे।

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हनुमान को श्रीराम इतने प्रिय थे कि ...
कथा में महाराज ने कहा कि प्रभु श्रीराम के राजतिलक बाद सभी वानरों को प्रभु श्रीराम ने विदा कर दिया। हनुमान वहीं रुके रहे। इस पर सभी परिजन एक-दूसरे से चर्चा करने लगे कि हनुमान को अब वापस चले जाना चाहिए। ये वही हनुमान थे, जिन्होंने श्रीराम की खातिर माता सीता तक संदेश पहुंचाने अशोक वाटिका गए थे।

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अपने प्रभु श्रीराम की खातिर लक्ष्मण की जान बचाने के लिए संजीवनी बूटी लेकर आए थे। असल में हनुमान को प्रभु श्रीराम इतने प्रिय थे कि संकोचवश कोई उन्हें वापस जाने के लिए नहीं बोल पा रहा था। अपने प्रभु के प्रति भक्ति ऐसी ही होनी चाहिए।