
रायपुर . छत्तीसगढ़ में गीदम के जंगलों के बीच एक अनोखा गणेश मंदिर है। यहां विघ्नहर्ता का जुड़वां स्वरुप विराजित है। जी हां बारसूर इलाके में जुड़वां गणपति है। यहां बप्पा की एक जैसी 2 मूर्तियां है। फर्क बस इतना है कि एक बड़ी तो दूसरी छोटी है। इन मूर्तियों की खासियत ये है कि यह दोनों ही मोनोलिथिक है। लोगों की मान्यताएं है कि यहां आकर दर्शन करने वालों के कष्ट विघ्नहर्ता हर लेते है।
ये दोनों मूर्तियां मोनोलिथिक हैं। यानि कि एक चट्टान को बिना काटें छांटे और बिना जोड़े-तोड़े बनाई गई मूर्तियां। इन मूर्तियों को गढ़ने में कलाकार ने गजब कलाकारी दिखाई है। जहां एक मूर्ति में लड्डू छुपा के या संभाल के रखे गए है तो वही दूसरी मूर्ति में बप्पा इन लड्डुओं का भोग लगा चुके है। कलाकार ने एक ही पत्थर में 2 अलग- अलग भाव दर्शा दिए है। ये दोनों मूर्तियां बालू यानि रेत के चट्टानों से बनी हुई है।
एक ही मंदिर में 2 अष्ट विनायक की 2 प्रतिमाओं का होना अपने आप में ही दुर्लभ है। यहां गणपति की बड़ी मूर्ति साढ़े सात फीट तथा छोटी मूर्ति साढ़े 5 फीट लम्बी है। इस मूर्ति को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी प्रतिमा माना जाता है। स्थानीय लोग बताते है कि ये मंदिर यहां के राजा ने अपनी बेटी के लिए बनवाया था।
बारसूर में कभी 147 मंदिर और अनेक तालाब हुआ करते थे। बारसूर को तालाबों और मंदिरों का शहर कहा जाता था। जहां कभी 147 मंदिर हुआ करते थे वहां आज सिर्फ 5 या 6 मंदिर बचे हुए है। अधिकांश तालाब सूख चुके गए।
Published on:
09 May 2018 08:00 am
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