20 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

गांव के बच्चों के खेल होते हैं बड़े ही निराले

देशी जुगाड़ से खिलखिलाता प्यारा बचपन

2 min read
Google source verification
गांव के बच्चों के खेल होते हैं बड़े ही निराले

गांव के बच्चों के खेल होते हैं बड़े ही निराले

मैनपुर। गांव का बचपन शहर से बिल्कुल अलग होता है। शहरों में बच्चों का बचपन अब महंगे खिलौनों, मोबाइल के साथ बंद कमरों में सिमट कर रह गया है, जबकि गांव में बच्चों का बचपन उससे हटकर होता है। ना उनके पास महंगे खिलौने होते हैं और ना ही उनके हाथों में मोबाइल। गांव में बच्चे खुले आसमान के नीचे प्रकृति की छांव में कभी गिल्ली-डंडा तो कभी कंचे का खेल तो कभी घर में पड़ी साइकिल का टायर और गांव के तालाब में डुबकी ही जहां उनके खेल का हिस्सा होते हैं। वहीं, उनको शारीरिक रूप से हर परिस्थितियों से लडऩे के लिए मजबूत भी बनाते हैं। समय के साथ गांव के बच्चे भी खेल के लिए देशी जुगाड़ से नए-नए आविष्कार कर उससे खेलकर अपना बचपन जी रहें हैं। ऐसा ही कुछ देशी जुगाड़ से बच्चों के निराले व अनोखे खेल को बहुत ही करीब से हमारे रिपोर्टर ने निहारा है। जहां स्कूल खुलने के साथ ही ग्रामीण इलाकों के बच्चों की मनोरजंन की अलग तरह की झलक देखने को मिल रही है।
ग्रामीण अंचल के बच्चे अपने मौज-मस्ती और खेलने के लिए खुद देशी जुगाड़ से बहुत सारे खिलौने, सवारी गाड़ी बना करके आनंद और मस्ती में सराबोर रहते हैं। निष्कपट और निश्चल भाव से नि:संकोच खुलकर खुशियां बटोरते हैं। खूब मौज-मस्ती करते रहते हैं। खिलौने वही सच्चे होते हैं जिनके साथ खेलते समय उनके टूटने का भय न हो। नए युग के अधिकांश महंगे खिलौनों में टूटने का डर हमेशा बना रहता है। बच्चे निडर भाव से खेलें, आनंद लें, खुल कर खुशियां बटोरें तभी तो खेल हुआ, खिलौने हुए। शहरों की भांति ग्रामीण अंचलों के बच्चे भी देशी जुगाड़ से बहुत सारे आविष्कार करते हुए स्वयं उसका उपयोग करके निडर भाव से खेलकूद किया करते हैं। ऐसा ही देशी जुगाड़ से गरियाबंद जिले के विकासखंड मैनपुर के राजापड़ाव क्षेत्र के जरहीडीह में ग्रामीण बच्चे साइकिल के खराब पहियों से लकड़ी के सहारे वाहन बनाकर उस पर सवार होकर बड़ी ही मासूमियत के साथ खेलकर मुस्कुराते हुए मिले। बचपन बड़ा सुहाना हुआ करता है। देश दुनिया से बेखबर कोई मन में खोट और ऊंच-नीच की भावना नहीं। इससे निर्मल उदाहरण और क्या होगा कि एक वाहन पर चार दोस्त बैठकर नीचे समभाव से दोस्ती का फर्ज निभा रहे होते हैं। शहरों में ऐसा देखने को नहीं मिलता है। थोड़े समय के लिए ही सही देश- दुनिया की सैर करके आ जाते हैं, ऐसा निश्चल भाव को सिर्फ गांव में ही देखने को मिलता है।