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इंटरव्यू में पूछा-किसी मामले में आपके पिता आरोपी बनकर आएं तो क्या करेंगी?

सिटी की अंकिता बनी सिविल जज टॉपर, बेटियों का रहा दबदबा

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इंटरव्यू में पूछा-किसी मामले में आपके पिता आरोपी बनकर आएं तो क्या करेंगी?

जबलुपर में सिविल जज हैं रायपुर की अंकिता अग्रवाल।

ताबीर हुसैन @ रायपुर। सीजीपीएससी की ओर से आयोजित सिविल जज परीक्षा में रायपुर फाफाडीह की अंकिता अग्रवाल ने टॉप किया है। उन्हें मेंस में 82.5/100 और इंटरव्यू में 13/15 माक्र्स हासिल किए हैं। इंटरव्यू में 3 सदस्यीय पैनल ने अंकिता से पूछा- किसी मामले में आपके पिता आरोपी बनकर आते हैं तो आप क्या करेंगी? इस पर अंकिता ने जो जवाब दिया उससे पैनल सन्तुष्ट नजर आया। अंकिता ने कहा-मैं अपने सुपीरियर ऑफिसर से रिलेशनशिप के बारे में बताऊंगी और अगर उन्हें लगता है कि मैं निष्पक्ष फैसला दे सकती हूँ तो मैं केस कंटिन्यू करूंगी। नहीं तो वो केस ट्रांसफर हो जाएगा। बताते चलें कि अंकिता ने हिदायतुल्लाह लॉ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया है। इसके बाद वे कोचिंग के लिए इंदौर गईं। 2019 में एमपी में सिविल जज का एग्जाम दिया और सेकंड टॉपर रहीं। वे अभी जबलपुर में पोस्टेड हैं। पिता मोहनलाल अग्रवाल बिजनेसमैन हैं और मम्मी मंजू अग्रवाल हाउसवाइफ। नतीजे में महिला अभ्यर्थियों का दबदबा रहा। &9 में से 25 महिला अभ्यर्थियों का सिविल जज में चयन हुआ है। चौथी रैंक पर शैलेष कुमार वशिष्ठ, छठवीं रैंक हर्षि अग्रवाल, सातवीं मीनू नन्द, दसवां स्थान काम्या का रहा।

ऐसे हुईं प्रेरित

एचएनएलयू में पढ़ाई के दौरान डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में इंटर्नशिप कर रही थी। तभी मैंने कई जजों का काम देखा। तभी मैं ज्यूडिशरी में आने के लिए प्रेरित हुई और मैंने तैयारी शुरू की।


ये रही स्ट्रेटजी

चूंकि मैं पहले ही एग्जाम दे चुकी हूँ और अभी सिविल जज हूँ इसलिए काफी सारी चीजें मेरे लिए आसान रहीं। प्री के लिए एग्जाम से पहले आपका सारा सिलेबस कम्प्लीट हो जाना चाहिए। जिस दिन पेपर हो तब तक तीन-चार बार रिवीजन हो जाना चाहिए। प्री के लिए मेनली बेर एक्ट पर फोकस करना चाहिए। मेंस में सिविल और क्रिमिनल दो जजमेंट आते हैं। इसके लिए एमपी और सीजी के पुराने पेपर सॉल्व कर लेने चाहिए। हर दिन कम से कम एक जजमेंट लिखने की कोशिश करनी चाहिए। अंकिता ने बताया कि उनकी रुचि डांस औऱ रीडिंग में है।

ये सवाल भी पूछे गए

सवाल- ज्यूडिशरी कई ऐसे फैसले देती है जिससे पब्लिक सटेसफाई नहीं होती, इस पर आप क्या सोचती हैं?

जवाब- किसी भी फैसले पर कोई न कोई पार्टी ऐसी होती है जो संतुष्ट न हो। लोगों के पास अपनी बात या विचार रखने का अधिकार है। ज्यूडिशरी को इन सब चीजों से फर्क नहीं पडऩा चाहिए। पब्लिक ओपिनियन से खुद को इफेक्ट नहीं करना चाहिए।

सवाल- किसी केस में आप किसी विक्टिम को जानते हैं तो क्या करेंगी?

जवाब- अगर मैं किसी भी पार्टी को जानती हूँ, तो यह मेरी ड्यूटी है कि अपने सुपरियर को बताऊं। वे चाहें तो मैं केस पर बनी रहूंगी।

सवाल- आप एमपी छोड़ छत्तीसगढ़ क्यों आना चाहती हैं?
जवाब- होमटाउन में रहूंगी तो घर-परिवार के साथ रहूंगी। किसी तरह का तनाव भी नहीं होगा। इमरजेंसी में वहां से आने में कई घंटे लग जाते हैं। उधर कहीं और पोस्टिंग हो गई और डिस्टेंस एेसा रहा कि कभी फौरन घर आना हुआ तो दूरी की वजह से परेशानी होगी। इधर पैरेंट्स भी चिंतित होंगे।

पिता का सपना बेटी ने किया पूरा

सेकंड टॉपर दिव्या गोयल जांजगीर की रहने वाली है लेकिन इस परीक्षा की तैयारी रायपुर में रहकर की। वे बताती हैं कि पापा उमेश गोयल बिजनेसमैन हैं लेकिन वे जज बनना चाहते थे। एलएलबी किया लेकिन कंडीशन ऐसी बनी कि वे उस दिशा में आगे बढ़ नहीं पाए। आप ये मान सकते हैं कि मैंने उनका सपना पूरा करने के लिए उन्हें प्रेरणास्रोत माना। मेरी मम्मी सन्तोष गोयल हाउसवाइफ हैं।

इंदु मल्होत्रा को देख बुना ख्वाब

थर्ड रैंकर सुंदरनगर निवासी ऐश्वर्या दीवान सुप्रीम कोर्ट की जज इंदु मल्होत्रा को आइडल मानती हैं। इंस्पिरेशन पिता अनुराग दीवान से मिली। वे ज्वाइंट डायरेक्टर, मॉइनिंग डिपार्टमेंट हैं। मम्मी प्रिया दीवान हाउसवाइफ हैं। ऐश्वर्या छत्तीसगढ़ स्टेट बायोडायवर्सिटी बोर्ड में लीगल असिस्टेंट थीं।

इंजीनियर आफरीन को जजों के रिस्पेक्ट ने किया अट्रैक्ट

फिफ्त रैंकर बिलासपुर की आफरीन बानो ने कम्प्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग किया है। लॉ ज्वाइन करने के बाद से ही तैयारी जारी थी। एलएलबी की गोल्डमैडलिस्ट हूं। इसलिए टॉप फाइव में आने की उम्मीद तो थी। जजों की रिस्पेक्ट से मैं अटै्रक्ट हुई और ज्यूडिशरी में आने का सोचा। रेगुलर पढ़ाई करना मेरी स्ट्रेटजी में शामिल है। इंटरव्यू में मुझसे ज्यादातर मुस्लिम लॉ के बारे में पूछा गया। यह भी पूछा गया कि आप इंजीनियरिंग से इस फील्ड में कैसे आईं। इसके अलावा मीडिया ट्रायल, प्रशांत केस और ट्रिपल तलाक पर सवाल पूछे गए।

लीगर रिसर्च असिस्टेंट प्रज्ञा को मिली कामयाबी

रायपुर कुशालपुर निवासी प्रज्ञा अग्रवाल ने आठवीं रैंक हासिल की है। पिता मुकुंदकांत अग्रवाल बिजनेसमैन हैं और मम्मी संध्यालता अग्रवाल हाउसवाइफ। वे कहती हैं, जब से मुझमें मै'योरिटी आई है मैं इसी फील्ड में जाना चाहती थी। पहले अटेम्प्ट में ही मैंने यह एग्जाम क्रेक किया है। मैंने कोई इ'छा ही नहीं रखी, क्योंकि मैं कोई भी चांस नहीं लेना चाहती थी। मेरी फैमिली में दूर-दूर तक लॉ की फील्ड में कोई नहीं है। इंटरव्यू में पूछा गया कि लॉकडाउन में अगर पुलिस ऑफिसर की बात नहीं मानी जाए तो पुलिस ऑफिसर के पास क्या ऑप्शन रहेगा? इस पर मैंने बताया कि वे कम्पलेन फाइल कर सकते हैं एफआईआर रहीं। मैं ज्यादा सोशलाइज नहीं हूं इसलिए जज बनने के बाद प्रोटोकाल फॉलो करना कठिन नहीं होगा। मेरा बीएएलएलबी 2018 में कम्पलीट हुआ था। मंत्रालय में मैं एक साल तक लीगर रिसर्च असिस्टेंट के तौर पर काम किया है। यह मेरा पहला ही प्रयास था।

असफलता को बनाया सीढ़ी, मिली सफलता
नौवीं रैंकर राजधानी में पिछले पांच सालों से लेबर इंस्पेक्टर का दायित्व निर्वहन कर रही स्वर्णा डेहरे का यह दूसरा प्रयास था। पिछली बार मिली असफलता को सीढ़ी बनाकर सफलता का मार्ग प्रशस्त करने वाले स्वर्णा कहती हैं कि दायित्व और अधिकार के बारे में जानना है तो देश के कानून की जानकारी होनी चाहिए। इसलिए मैंने यह फील्ड चुना। वैसे तो मेरा गृहग्राम दुर्ग जिला को मलपुरीखुर्द है लेकिन मेरी पढ़ाई रायपुर में हुई। स्कूलिंग सालेम इंग्लिश स्कूल से और डीबी गल्र्स कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद पीजी रविवि से। यूजी और पीजी का विषय बॉयोटेक्नोलॉजी रहा। दोनों में मैरिट फस्र्ट रैंक थी। एमएससी में गोल्ड मेडल था। पिता सीएस डेहरे, आईएएस ऑफिसर हैं। मम्मी डॉ. शकुंतला डेहरे, संस्कृत कॉलेज में प्रोफेसर हैं। पैरेंट्स मेरे प्रेरणास्रोत थे। टॉप टेन में आ जाऊंगी सोचा नहीं था क्योंकि लेबर इंस्पेक्टर की जॉब के साथ इसकी तैयारी की। जज बनने के बाद प्रोटोकाल के तहत पाबंदियां होंगी, आप इसे किस रूप में लेती हैं? इस पर स्वर्णा ने बताया, मेरा लक्ष्य रहा है कि सोसायटी को जस्टिस्ट देना है। जब भी अपने आसपास देखती हूं कि किसी के साथ बुरा हो रहा है तो मैं सोचती हूं कि उसे कैसे न्याय दूं। अगर मैं वही ड्यूटी करूं तो इससे अ'छी कोई बात नहीं हो सकती। इसके लिए लिमिटेशन दे सकती हूं।