24 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

छत्तीसगढ़ी साहित्य के अगासदिया डॉ. परदेसी राम वरमा

एक चरवाहा अपन गाय-बछरू ल चरावत बांसुरी बजावत रम जथे, वोइसने डॉ. परदसीराम अपन गांव के, अंचल के घटना अउ बात ल कहिनी म लिखथे। वोकर पात्र के चारित्रिक गरिमा ह सच्चाई ले भरपूर रहिथे। पढ़त समे अइसे लगथे जइसे हम वो गांव में पहुंच गे हन। वो पात्रमन के बीच म बइठे हमरो उपस्थिति हवय।

3 min read
Google source verification
छत्तीसगढ़ी साहित्य के अगासदिया डॉ. परदेसी राम वरमा

छत्तीसगढ़ी साहित्य के अगासदिया डॉ. परदेसी राम वरमा

सूरज जस साहित्य संसार म एकेच नाव हवय, जउन जगमग -जगमग करत रहिथे। कतेक सुग्घर बात कहिस हवय-

बहुत छोटे है मुझसे मेरे दुश्मन।
जो मेरा दोस्त है,
वो मुझसे बड़ा है।
साहित्य के सबो विधा म लिखइया बहुतेच कम हवय। छत्तीसगढ़ के लिखइयामन के बीच एके नाव सबके जुबान म बोलत सुने जाथे। वो नाव हवय डॉ. परदेसी राम वरमा।
छुटपन ले दाई के कोरा म सुते-सुते कहिनी सुनत कब आंखी मुंदा जाय ऐकर वोला कभु पता नइ चलिस। वोकर दिमाग म दाई के कहिनी ह भंवरा जइसे मन म आगू -पीछु घूमत रहय। एक दिन दाई ह वोला भक्त ध्रुव के कहिनी सुनाथे। वोकर सउत महतारी छोटकी रानी ह धु्रव बेटा ल राजा बाप के कोरा ले उतार देथे, अउ कहिथे ऐ कोरा म सिरिफ मोरे बेटा ह बइठही। तेहा जा अपन महतारी तीर। अतका सुनतेच लइका धु्रव अपन महतारी बडक़ी रानी तीर जाकर रोय लगिस। तब वोकर महतारी ह वोला समझाय। तोर राजा बाप के कोरा ले ऊंच भगवान के सिंहासन हवे, जिहां ले तोला कोनो नइ उतार सकही। सच दाई, हां बेटा। भक्त धु्रव के नाव ल सबझन जानत हवय। वोहा रात- दिन ओम नमो भगवते वासुदेव के पाठ ल करत रिहिस। अइसन वोकर तप ले भगवान खुस हो जाथे अउ वोला अपन कोरा म बइठा लेथे। आज जुग बीत गे हे, तभो ले सबझन भक्त धु्रव के बारे म जानत हवय अउ वोकर पांव परत रहिथें। आजो अकास के रक्सहू डहर म धु्रव तारा ह जगमग-जगमग करत रहिथे।
लइका परदेसी ह अपन कलम ल उठाके सबले पहले कविता लिखे के कोसिस करे लगिस। थोकिन दिन म कतकनो कविता लिख डारिस।
धीरे-धीरे किरण अंधेरों को
धकेल कर आती।
धीरे-धीरे जले रात भर
एक छोटी सी बाती।
सबले पहिले छोटे-छोटे कविता गजब अकन लिख डारिस। फेर बड़े-बड़े साहित्यकारमन के किताब ल मन लगा के पढ़े लगिस।
18 जुलाई 1947 के छत्तीसगढ़ के दुरूग जिला के लिमतरा गांव म वोकर जन्म होय रिहिस। बालपन ले आगू बढ़े के मारे जउन मन म सोचे वोला लिखे लागिस। छोटे-छोटे लइकामन बर घलो लिखिस। पसीना ले तर हो जाय, फेर अपन कलम ल नइ छोड़े। आगू सरलग लिखथे रहय।
बाल कहिनी अउ ‘नुक्कड़ में हलचल’ परकासित होगे। ऐकर से वोला खुसी के ठिकाना नइ रिहिस। अब तो पीछु पलट के देखेच बर भुलागे। ऐ बीच म हिन्दी, लोक परसासन अउ समाज सास्त्र म एम.ए. के परीक्छा पास कर डारिस। घर के खरचा चलाय बर जइसन नौकरी मिलिस वोला मन लगा के करे लगिस। इति उति भटकत-भटकत एक दिन बीएसपी के सामुदायिक विकास विभाग के सांस्करीतिक परकोस्ठ म नौकरी मिलगे। छुटपन म लिमतरा के लीला मंडली म लछमन अउ राम के भूमिका म खूब परसंसा बटोरे रिहिस। दिन प्रतिदिन, बुधिया की तीन रात, संतरा बाई की सरत, औरत खेत नहीं, कहिनी संगरह दिल्ली वानी परकासन से परकासित होइस। उपन्यास प्रस्थान हिन्दी, आवा छत्तीसगढ़ी, जतन छत्तीसगढ़ी, सूतक। हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी दूनों भासा म परदेसीजी के समान अधिकार हवय। कतकोन किताब सम्पादित घलो करे हवय। लोक कथा घलो लिखे हवय। ‘अपने लोग’ संस्मरन साहित्य हवय। वोहा सात खंड म परकासित होइस।
2003 म रविसंकर विस्वविद्यालय ले परदेसीरामजी ल मानद उपाधि (डी.लिट) से विभूसित करे गिस। सुंदरलाल सरमा पुरस्कार से सम्मानित करे हवय। रायपुर दूरदरसन ले लोकवा मितान, टोटका के फोटका, दुलारी आदि परसारित होइस। कबीर दरसन के साहित्यिक पत्रिका दस अंक म परकासित होइस। नेसनल बुक ट्रस्ट नई दिल्ली ले परदेसीजी के कईठिन किताब परकासित होय हवय। साक्छरता ले संबंधित घलो कहिनी लिखे हवय। ‘मैं बइला नोहव’ छत्तीसगढ़ी नाटक परकासित होय हे।
डॉ. परदेसीरामजी के आकासदिया पत्रिका के 30 ले जादा अंक निकल गे हे। अखिल भारतीय रास्टरीय स्तर के पत्रिकामन म आपके कहिनीमन ल पुरस्कर मिले लगिन। डॉ. परदेसीराम वरमा के कहिनी गांव के लोगन के भावना अउ बिचार, उंकर मनोदसा ल बताथे। कहिनी ल पढ़त रहव त अइसे लगथे मानो गांव के बारे म जम्मो जानकारी मिल गे। गांव के रीति-रिवाज अउ परम्परा अउ रूढि़वादिता के खंडन करके वोला सच्चाई के संग आदर्सवादिता म जोडक़र चारित्रिक गरिमा ल उजागर करने म डॉ. परदेसीरामजी सिद्धहस्त हे। गांव म जउन सब्द बोले जाथे वोकर सुग्घर परयोग करत वोकर हिन्दी सब्द घलो कोस्टक म लिखथे, ताकि हिन्दी जनइयामन ल सुभित्ता हो।

- डॉ. नलिनी श्रीवास्तव, सेक्टर-1, भिलाई (दुर्ग)