
महतारी भासा
छत्तीसगढ़ी दाई के दूध के नांव ए, अउ बड़े दाई के दुलार ए, बूढ़ी दाई के चोन्हा चुम्मा ए, बबा के मया ए, सुआरी के सेंदुर ए, बहिनी के राखी ए, गुइयां के भोजली ए।
छत्तीसगढ़ी अइसन भासा ए, जउन हिंदी म घुर-मिलके रास्टरीयता बनाथें, तभो ले वोकर मन चिन्हारी अपन संग्या, अपन सरवनाम हावय। छत्तीसगढ़ी भासा के अपन इतिहास, अपन परंपरा अउ संस्कीरीति म साधु-संत के सांस धड़कत हे। वोकर पानी, पसीना पुन्न के पदुम पराग हे।
छत्तीसगढ़ी वो सबरी हे, जउन हिंदी के राम ल बनबोईर के अम्मठ, गुरतुर सेवाद ल चिखाइस। तुलसी बबा के रमायन एकर साखी हे। छत्तीसगढ मोर दाई-माई ए। मेहा वोकर दुलरुवा बेटवा। पइयां परत हंव, जनम-जनम के जनमभूमि, जियत भर के करम भूमि, पूजा-पाठ के धरम-भूमि, अउ सांस सिरागे त मरन भूमि। मरघट ले लेके पनघट तक, पनिहारिन ले लेके सुआरी तक, परसार से ओसारी तक, पिंउरी ले रंड़सारी तक, नांगर ले तुतारी तक, उन्हारी ले सियारी तक, बासी ले बियासी तक, तरवार ले कटारी तक, मूढऱ ले लेले खोल दुवारी तक, तोरन ले लेके चउंक कुसियारी तक, बहुरिया ले कुंआरी तक, सुखिया ले दुखियारी तक, सूपा ले कलारी तक, बबा पुरखा ले महतारी तक, बाबा बैरागी ले संसारी तक, गोरी ले कारी तक, अंगना ले बारी तक, बरा ले लेके सोंहारी तक, होरी ले लेके हरेली तक हमर छत्तीसगढ़ के चिन्हारी एं। घर-दुवार तोर, डेहरी मं गोड़ झन धरवे-अइसनहा झन होवय।
छत्तीसगढ़ के अमरइया मं, तरइया म कोइली टेही पारत हे। बसंती बड़ोरा बिजनी डोलावत हे। दंतेस्वरी दाई के दया ले, महामाया के मया ले, डिडिंनदाई के दया ले, अरपा नदिया ले लेके महानदी तक, सतखंडा महल ले लेके कुरिया, कुंदरा तक, जंगल ले मंगल तक, बिहाव ले लेके बुंदा तक, फूल के डार ले खेत-खार तक, सोम ले इतवार तक, पइरी ले लेके ढार तक। पंडा बिन पिंडा नहीं,डंडा बिन डंडा नहीं। अंड़वा बिन कुकरी नहीं, कुबरी बिन डोकरी नहीं, पानी बिन नदिया नहीं, लौठी बिन पहटिया नहीं, चंदा बिन रथिया नहीं, सुरूज बिन दिनमान नहीं, सोना बिन धनवान नहीं, बांस बिन विमान नहीं, भगत बिन भगवान नहीं।
छत्तीसगढ़ ल सोसक मन चुहक डारिन। गरीब कमिया, कमेलिन मन तीर न कमर भर धोती हे, न पेट भर रोटी हे। डोंगरी-खार के वनवासी, टूरा-टूरी-मोटियारी मन के फोटो ले लेके परदेसी मन मजा लेथें। सच्ची कइहां त खार-पहार के बेटी, धरती के नोनी, छत्तीसगढ़ के दुलौरिन, ठठ्ठा-मसखरी के मोटियारी ऐ, बेटी ए, बहुरिया ए, सीता ए, जसोदा ए, राधाए, मीरा ए, देवी ए, दाई ए, माता ए, महतारी ए, हर कमल-खोखमा, चंदा-चंदैनी, नोहे टेसी के फूल ए, जउन खार-दइहान म, कांटा-खूंटी म, डोंगरी-पहार मं फूलथे, फरथे। खोररा खटिया, कांदी के कुरिया म, पेज-पसिया, कोदो- कांदा, बासी-बोरे ये सब वोकर जिनगी- जिनगारी हे।
छत्तीसगढ़ के चारों कोती मउत हे, धूंकी गररा हे, जंगल के सुन्न सायं-सांय हे डोंगरी के डर हे, बिखहर सांप के बिल हे। बघवा-भालू जौंहर काल हें। फेर दुकाल-अकाल, भूत-परेत, बधवा-मसान, मटिया-मिरचुक, बरमराच्छस, भैंसासुर, धुंकीदाी, महामारी हे। भारी कलकिथवा म वो हर गाथे-बजाथे, होम-धूप देथे, पूजा-पाठ करथे। हमर राज बन गे हे फेर, सूम के धन, बमूर के खूंटा त जेठानी बर लूटिक लूटा त, कहूं लइका के चरवाही म गाय कसही झन हो जाए, अपन हर बर लड़े बर परही-सावचेत रहा- एक बार रांधय खटा महेरी, एक बर निरमल खीर। एक बर पटोर पोतिया, एक बर लट्ठा चीर। खाय-भात चांउर झ करिहा! सत-ईमान ले नवासुरूज ला परघावा।
Published on:
08 Mar 2019 07:19 pm
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