
हेलमेट के आत्मकथा
गोदाम म सरत, कोंटा म फेंकाय, बस्सावत परे रहय मुड़ीराख नाव के जिनीस ह। एक दिन गोदाम के टेलीवीजन म देख परिस के कइसे कोनो मनखे ह देवता ल परसन्न करके अपन मनोकामना के पूरति कर डारथें। वहू सोच डरिस - उइसने करे के। वोकर आगू म समसिया ए रिहिस के ए काकर तपसिया करे। वोहा सोचिस के ए मनखे ल भगवान बनाय, तेकर सेती वोमन वोकरे नाव के तपसिया करथें। मोला मनखेमन बनाय हे, वोकरे नाव के तपसिया करे जाय।
दूसरेच दिन अपन बनइया मनखे के नाव ल घेरी-बेरी रटे लागिस। कतको महीना गुजरगे, फेर कोनो वोकर अवाज ल सुनही। सुनवई नइ होइस। तभे उही गोदाम म काम-बूता करइया मनखेमन के बीच के गोठ बात ल सुन डरिस मुड़ीराख (हेलमेट) ह। बनिहारमन आपस म गोठियात रहय के ए मनखेमन बर कतको तपसिया कर ऐमन गुनहगरा आय। कोनो भलई नइ होना हे। वोहा सोंचिस के जब मनखेमन अपनेच परजाति के नइ होइस त हमर का होही? भइगे, तेकर ले भगवाने के तपसिया करे जाय। भगवान के तपसिया सुरू कर दीस। चारेच दिन म बरम्हा के आसन डोले लागिस। परगट होगे। बरम्हा पूछथे - कोने जी काये समसिया हे तेमा काबर मोर आसन ल हलल-भलल डोलावत हव । भगवान ल देखिस तहां ले मुड़ीराख ह जोर से चिचियावत कहे लगिस - मोर नांव मुड़ीराख हे भगवान, महीं तोला सोरियाय हंव। जेला बरम्हा बनाय तेकरे अवाज ल बरम्हा सुनही, मुड़ीराख के का सुनही। रेंगे लगिस त मुड़ीराख फट ले भुइंया म उलंड गे। बरम्हा ल समझ अइस के इही बलाय हे। मुड़ीराख के आंखी ले बोहावत आंसू ल पोंछत कहिस - तोला हमन बनाय नइयन जी, जे बनाय तिहीमन तोर समसिया के समाधान करही। तोला कोन बनाय हे महूं नइ जानंव। तोर निरमान करइया तिर जाथंव अउ अइसे मंतर चलाहूं के तोर कोती झांके बर मजबूर हो जही।
मुड़ीराख (हेलमेट) खुस होगे। वोला पहिली बेर अभास होय लगिस के वोकर बने दिन लकठियागे। रेंगत बनिहारिन के घिरलत लुगरा म पोंछा गीस त वो दिन तिहार कस होगे वोकर बर। दूसर कोती बरम्हा परेसान। हेलमेट के बनइया ल खोजिस। उहींचे सरग म मिलगे। बरम्हा कहिथे- अरे मनखे तैं हेलमेट ल बनाके सरग आगेस अउ मजा करत हस। हेलमेट के का गत होवत हे तेला जानथस। वो मनखे कहिथे- वा! हमन तो पिरथी म मजदूर रेहेन भगवान। हमर मालिक जेन चीज बनाय बर कहिस, बना देन, हमर काये दोस। मालिक ल खोजिस - उहू कुछेच दिन पहिली नरक भोक के सरग म अमरे रहय। वोहा कहिथे -मनखेमन ल दुरघटना म मुड़ी के भार गिर के मरत देखेंव, मोला ऊंकर जान बचाय के उदिम म पइसा के आवक घला दिखा गीस। तेकरे सेती बना डरेंव। मोर लइकामन बेंचे नइ सकही, त मेहा का करहूं? वोला सरकार म बइठे मनखेमन बेचन नइ देवत हें। उहूमन का करहीं। बरम्हा ह सरकार करा जाये के सोचिस। ले-दे के सरकार मिलिस। डरेस बदल के चल दीस मुलाकात बर। सरकार दिख गे। बरम्हा सोचे लगिस या ऐहा मुड़ी म कांहिच नइ पहिरे हे जी। ऐहा कइसन किसिम के सरकार आय। हमर सरग म बिन पागा के कोनो हुकुम नइ चलावन।
बरम्हा हांक पारिस- सरकार, सरकार! सरकार कहिथे- कोने बे। काबर हकन के नरियावत हस? का दुख-पीरा हमागे तेमा? बरम्हा जी ह कभु गारी नइ सुने रहय। फेर का करबे खुरसी के डोलइ सुरता आ गे।् वोकर आगू कोन नतमसतक नइय। बरम्हा कहिथे- सरकार मनखेमन दुरघटना म मरत जात हे। मोर करा वोमन ल बचाय के ए उपाय हे। आप आगिया देहू त पेस करहूं। सरकार कहिथे- अरे मुरूख, मनखे का ये दुनिया म जतका झिन पइदा लेहे, मरेच बर तो लेहे का? समे पुर जथे त भगवानों ह नइ राखे इहां। तोर उपाय हा काला बचा डरही। बरम्हा कहिथे- नइ सरकार, मोर उपाय वइसन नइये । मोर बनाय चीज ल जेन मनखे अपन मुड़ी म धारन करही, तेहा कतको जोर ले गिरे, फेरनइ मरय।
चपरासी पट ले मारिस -सरकार तुंहर ले जादा कोनो नइ गिरय, तुहींमन राख लव। सरकार भड़कगे- हमन गिरथन त मरे बर नइ, मारे बर गिरथन। रिहिस बात मनखे ल बचाय के त हमन जनसंख्या नियंत्रन के कतको उपाय करके मनखे के संख्या घटावत हन। तोर उपाय ले तो संख्या अउ बाढ़ जही। बरम्हा कहिथे- नइ मालिक, वोकरो उपाय बताहूं न। सरकार कहिथे - देख बाबू, अइसे उपाय झिन बताबे के सरकार के किरकिरी होये। बीते समे परिवार नियोजन के अपरेसन अउ आंखी के इलाज के बहाना जनसंख्या घटाय के फेर म बड़ सुने ल परगे। बरम्हा कहिथे - वाह सरकार! ऐहा उसने नोहय। ऐला पहिर के मनखे जब फटफटी म भुर्र ले उड़ाही त तुंहर खंचका-डबरा म कतको गिरे, नइ मरय। सरकार कहिथे - अरे मुरुख, खंचका-डबरा म काबर चलाही। बरम्हा मुसकावत कहिस - वा! जम्मो रोड म खाली खंचका-डबरा दिखथे। दूसर फायदा ए हे सरकार के, मर जथे त तुमन ल मुआवजा बांटे बर परथे, उहू बांच जही। माने तुंहर इज्जतो बांचगे अउ पइसा घला। चपरासी फेर मारिस टप्पले - मुआवजा बांटे म कतका बांचथे, तेला तैं का जानबे जी।
सरकार कहिथे- चुप रे, बड़ पुटुर-पुटुर मारे। देखा जी काये लाने हस। बरम्हा जइसे खोखा ले बाहिर लानिस, सरकार कहिथे या एतो मुड़ीराख (हेलमेट) आय रे। मेहा समझे रेहेंव कहीं नावा चीज होही। एकठिन बात बता, ऐला पहिरे ले जनता के जिनगी बांचगे, सरकार के इज्जत बाढग़े, ऐला बेंच के तोरो समपत्ती बाढग़े, मोर का बाढ़ही? बरम्हा सोचे नइ रिहिस - ए सुवाल के उत्तर। काली सोच के बताहूं कहत निकलगे बरम्हाजी। दूसर दिन फेर पहुंचगे। दूसर दिन दूसर सुवाल, ए तीसर दिन तीसर। हरेक दिन नवा-नवा सुवाल खड़ा हो जाय। बरम्हा काला समझही? परेसान, हक खा के बइठगे । सरकार के पार ल बरम्हा नइ पा सकिस। एक दिन एकझन मनखे ल खुसी-खुसी वोकर खोली ले निकलत देखिस खुसी के राज पूछिस अउ तरीका। वोहा बरम्हा जी ला 'सीबीआईÓ के मनखे होही कहिके नइ बतइस। फेर ऐहा तो बरम्हा आय, ऐकर बात ल जान डरिस।
दूसर दिन धन दउलत, माल खजाना लाद के चल दीस। रोज के रद्दा छेंकइयामन, रसता देबर खड़ा हो गीन आज। खुसरत -खुसरत सिपहियामन एक- एक मूठा म हाथ सफ्फा कर लीन। थोरिक आगू म चपरासी दू मूठा धर लीस। आपिस म फाइल संग किंजरत मूठा-मूठा हेरत हेरत आधियागे वोमे के सामान। हां, फेर सरकार खुस होगे। वोला का पता कतका कस लाने हे। उही दिन ले सरकार ऐलान करा दीस के, भलुक अभु तक मनखे बिन मुड़ीराख पहिरे मरत रिहिस, फेर ए पार कोनो ल अइसन मरन नइ देवन। अभु मरे के अधिकार सिरिफ उही ल रही जेन मनखे मुड़ीराख ल अपन मुड़ी म नइ धारन करही। लछमी के परभाव देख बरम्हा अवाक होगे। वोकर उदीम ले उही समे ले मुड़ीराख धड़ाधड़ बेचाय लगिस।
Published on:
18 Nov 2019 04:09 pm
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