
गुरतुर छत्तीसगढ़ी भाखा के बिकास
छत्तीसगढ़ी भाखा ह हमर महतारी भाखा ए जेकर ले हमर पहिचान हावय। छत्तीसगढ़ी भाखा ल जाने बर ऐकर इतिहास ल जाने ल पड़ही काबर के हमर छत्तीसगढ़ी भाखा अब्बड़ समरिद्व हावय। ऐमा बरनमाला, ब्याकरन, अलंकार, रस, छंद, कबिता, कहिनी, नाटक, उपनियास, एकांकी के बिसाल साहित्य के सागर हे।
छत्तीसगढी़ भाखा एक कोती अर्ध मागधी के दुहिता हावय त दूसर कोती अवधी, बघेली के सहोदरा हे। पूरवी हिंदी के साखा छत्तीसगढ़ी हे। भाखा बिग्यिान के बिद्वान रमेस चंद्र महरोत्रा के अनुसार छत्तीसगढ़ी के पांच रूप हावय-
पूरवी छत्तीसगढ़ी (लरिया नाव ले प्रचलित)।
पस्चिमी छत्तीसगढ़ी (खल्ताही नाव ले प्रचलित)।
उत्तरी छत्तीसगढ़ी।
दछिनी छत्तीसगढ़ी।
केंद्रीय छत्तीसगढ़ी।
छत्तीसगढी भाखा अउ वोला बोलइया मनखेमन अवधी भाखा बोलइया मनखेमन ले जादा हावय। भाखा अउ साहित्य परस्पर अवलंबित होथे। ये परकार ले छत्तीसगढ़ी भाखा अउ साहित्य के बिकास लगभग संगे-संग होइस।
डॉ. नरेन्द्र देव ह छत्तीसगढ़ी के उद्बिकास सीरसक गरंथ म परबित्ती के अनुसार काल बिभाजन करके छत्तीसगढ़ी भाखा अउ साहित्य ल मुख्यधारा ले जोड़े के परयास करिस। वोकर अनुसार काल बिभाजन-
गाथा जुग-(1000 से 1500 ई.तक)
भक्ति जुग-(1500 से 1900 ई.तक)
आधुनिक जुग-(1900 ई से अबतक)
गाथा जुग- सुरू के समे ल गाथा जुग के नाव ले जाने जाथे। ये जुग म रचना ल लिपिबद्व करे के परंपरा नइ दिखई देवय। सिरिफ मौखिक रूप ले पीढ़ी दर पीढ़ी ये जुग के साहित्यिक रचनामन संरछित रहिस। अपन समे के घटिक घटना के जीवंत रूप म मिलथे। ये जुग के साहित्य म बीरगाथा, परेम परधान गाथा के संगे-संग पौरानिक अउ धारमिक गाथा के झलक घलो मिलथे। परेम परधान गाथा म-अहिमन रानी, केवला रानी, रेवाराम, बीरसिंह के बड़े गाथा हावय। धारमिक अउ पौरानिक गाथा म- 'फूलबासनÓ के नाव आथे जेमा सीता अउ लछमन के गाथा हावय। पंडवानी म पांडवमन के गाथा। हरतालिका ब्रत (तीजा) के अवसर म द्रोपदी के मइके जाय के अमिट साध के माध्यम से नारी के सास्वत अकांछा के चित्रन मिलथे। ये परकार ले से जुग मौखिक रूप ले ही छत्तीसगढ़ के लोक जीवन, मानियता आदि ह जीवंत रूप म बरनित हावय। आज घलो ये भौतिकता वादी जुग म ये चेतना खतम नइ होय हावय। अपन परभावसीलता के कारन ही छत्तीसगढ़ी साहित्य ले जुड़े ये गाथा जुग ह सुवरन जुग के नाव ले घलो जाने जाथे।
भक्ति जुग- 1500 से 1900 ई. तक के समे ह राजनीतिक उथल-पुथल के रहिस। बाहिरी राजा मन के छत्तीसगढ़ म आक्रमन होत रहिस। ये काल म राजामन के बीरता के बरनन के संगे-संग साहित्य म भक्ति के धारा घलो बोहात रहिस। छत्तीसगढ़ म मध्य जुग म धारमिक अउ सामाजिक गीत धारा के सुरुवात होइस। संत धरमदास ह छत्तीसगढ़ के जनता म छत्तीसगढ़ी गीत के सफल परचार-परसार करिस।
आज घर आये साहब मोर,
हुलसि-हुलसि घर-अंगना बहारी,
मोतियन चऊक पुराई।
कुछ बिद्वानमन संत धरमदास ल छत्तीसगढ़ के पहिली कवि मानथे। ये जुग म अउ परसिद्व कविमन म गोपाल, माखन, रेवाराम, लछमन अउ प्रहलाद दुबेमन के बिसेस रूप ले नाव आथे।
आधुनिक जुग- ये जुग म छत्तीसगढ़ी भाखा साहित्य के बिबिध बिधा के बिकास होइस। काव्य के संगे-संग गद्य, नाटक, कहिनी, उपन्यास, पत्रकारिता के परयाप्त बिकास होइस। छत्तीसगढ़ी साहित्य म मानक-मूल्य के अस्थापना के संगे-संग बने परचार-परसार होइस।
पहिली चरन- पं. सुदंरलाल सरमा छत्तीसगढ़ के पुरोधा कवि अउ छत्तीसगढ़ी साहित्य के भारतेंदु के नाव ले जाने जाथे। इंकर छत्तीसगढ़ी रचना 'दानलीलाÓ म गोपी अउ किसन के गाथा के मनोहारी बरनन हावय। संगे-संग धारमिक परसंग के घलो बरनन हे। जगन्नाथ प्रसाद भानु, कपिलनाथ मिस्र अउ सुकलाल प्रसाद पांडेय परमुख कबि रहिन।
दूसर चरन-ये समे स्वतंत्रता आंदोलन देस म चरम म रहिस त ये चरन के साहित्य रचना स्वतंत्रता आंदोलन से प्रेरित रहिस। गिरधर दास बैसनव के रचना 'छत्तीसगढ़ी सुराजÓ म स्वाधीनता आंदोलन ले जुड़े घटना के बरनन हे। कुंज बिहारी चौबे, पुरुसोत्तम लाल, गोविंद दास, दलपत सिंह आदि ये चरन के परमुख कबि रहिन। द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्रÓ के रचना समाज-सुधार से जुड़े रहिस। बिप्रजी के 'सरद रितु आगेÓ सिरसक म परकिरीति परेम के झांकी दिखथे-
जग-जग ले अब चंदा ऊथे,
बादर भईगे दुरियर।
परिथी माता चारो खुंट ले,
दिखथे हरियर-हरियर।
Updated on:
25 Nov 2019 04:14 pm
Published on:
25 Nov 2019 04:13 pm
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