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पारंपरिक खेलकूद नदावत हे

लोकखेल

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पारंपरिक खेलकूद नदावत हे

पारंपरिक खेलकूद नदावत हे

छत्तीसगढ़ म नानपन ले लेके बड़े बाढ़त ले बिक्कट अकन खेलकूद हवंय। जेकर नांव घलो सुरता नइ आवय। फेर, जतका भी खेलकूद हवय तेहा बड़ मनोरंजक अउ सुवास्थ बर लाभदायक हवय। हमर सियानमन लइकईपन म खेलंय तेन खेल कहां गंवागें! भउरा, बांटी, गिल्ली-डंडा, कबड्डी, खो-खो, गेड़ी, तीरी पासा, रेस टीप, बिल्लस, छु-छुवल, सांप-सीढ़ी, भोटकुल, डंडा-पिचरंगा, पिट्टूल, फुगड़ी अइसने बहुत अकन खेलकूद हवय जेन हमर संस्करीति के पहचान हरय। हमर पारंपरिक खेलकूद खेले ले एक तो हमर संस्करीति ल संजोय के बुता करन। संगे-संग अपन सुवास्थ बर तको धियान देवन। तन अउ मन दूनों ह सही रइहीं तब काम-बुता सही होथे। खेले-कूदे ले हमर देह के खून ह दौड़थे जेकर ले तन-मन दूनों सुवस्थ होथे। कबड्डी ल मुख्य पारंपरिक खेल मानथंंन। ऐकर परतियोगिता तीजा- पोरा सहीन तिहार म करथन। फेर, सिरिफ तिहार बार म बस खेले ले हमर संस्करीति ल संजोय नइ जा सकय। वो जम्मो खेल ल सरलग लइकामन ल खेलाय जाय। इस्कूल म जागरूक करे जाय तभे हमर खेल संस्करीति बांच पाही।
लो क खेल ह मनोरंजन के संगे-संग गियान के बिसय घलो आय। आज के लइकामन टीवी देखई अउ वीडियो गेम खेलई तक सीमित होगे हे। जुर-मिल के नइ खेलबे तब तक खेल खेले के मजा नइ आवय, एक-दूसर बर सहयोग के भावना नइ आवय। नदावत पारंपरिक लोक खेल ल बचाय बर हमन कुछु नइ करत हन। खेल के सम्बन्ध लइकामन से हे। खेल के सम्बन्ध हमर गांव, हमर गली, हमर खेत, हमर तरिया, हमर डबरी, हमर रूख-राई, नदी अउ पहार से हाबे। गांव-गांव म इसकूल खुलगे। पढ़े-लिखे बर गांव ल छोड़ के हमन सहर म आवत हन अउ कहिथंन पारंपरिक खेल नदावत हे। सहर म आके हमन खेलकूद अउ गांव ल सुरता करथन। जइसे नउकरी-चाकरी म निकल के दाई-ददा ल भुला देथन वोइसने लोकखेल ल घलो भुला देथन। दुनिया के कोनो देस, गांव, सहर होय कोनो न कोनो रूप म लोकखेल मौजूद हे। ऐकर उपयोग अउ बढ़ावा के खच्चित जरूरत हे। लोकखेल खेले ले हमर नान-नान लोग-लइकामन के बुद्धि के बने बिकास घलो होही।
अपन पारंपरिक लोक खेल ल छोड़ई ह बने नोहय। अब के लइकामन ल छोड़व वोकर दाई-ददामन घलो कतकोन लोकखेल के नांव तको नइ जानंय। का-का लोकखेल होथें, कइसे-कइसे खेलथें तेन ल नइ जानंय। गिल्ली-डंडा, लंगरची, डंडा-पचरंगा, बांटी-भौंरा, पिट्टूल जइसे कतकोन लोकखेलमन गांव-गंवई म घलो खेलई कम हो गे हे।