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सिव बिहाव के परतीक ‘गौरा-गौरी

लोक परब

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सिव बिहाव के परतीक 'गौरा-गौरी

सिव बिहाव के परतीक 'गौरा-गौरी

गौरा ह छत्तीसगढ़ के जनजाति गोड़मन के परंपरागत तिहार ए। फेर, गांवमन म ऐला सबो जात-बिरादरी के लोगनमन मिरजुर के मनाथें। लछमी पूजा के दिन ल 'सुरहु्त्तीÓ कहिथें। 'सुरÓ के मायने हे देवता अउ 'होत्तीÓ के मतलब होथे पूजा। सुरहुत्ती के दिन लोक देवतामन के संगे-संग सबो परकार के देवी-देवतामन के पूजा करे के परंपरा हे। सुरहुत्ती के रातकुन गौरी-गौरा के सुग्घर झांकी निकालथें। परघाथें। परघवनी देखे बर गांवभर के मनखे सकला जथें।
गोड़मन के महादेव ह परमुख देवता ए। सिवस्तुति या सिव के उपासना के सबसे बड़ा परमान इही गौरा हे। बिहाव के समे दुवारी म बनाय गे कांसी के झंडा सिव के तिरसुल होये के संकेत देथे। बिहाव उत्सव के समे गोबर के छेना लटकाय जाथे। ऐला सिव के डमरू के परतीक कहे जाथे। सुरहुत्ती के पहिली नौ दिन तक माइलोगिनमन सकला के लोकगीत गाथें। गौरा ल जगाय के काम करथें।
सुरहुत्ती ह गौरी-गौरा के दिन होथे। सुरहुत्ती के एक दिन पहिली कुंवारी माटी लानथें।
बाजा-गाजा के संग कुवांरी बेटीमन भिंभोरा के माटी खान के गौरा चौरा म लानथें।
'मारे कुदारी ईसर धन के
उहां कुम्हार भइया करे ला बसेर
लगीन करसा गढ़ दे
नम्मे तेल के हरदी
नम्मे के ठसी हौं बरात
नवमी के तेल हरदी
दसमी के लगन हे
कातिक म ठसिहौं बरात।Ó
कुवांरी माटी ल बइगा के घर अमराथें। बइगा घर गौरी-गौरा के मूरति बनथे। मूरति बनाय ले लेके, गौरा चौरा म बिराजित करे के जम्मो जिम्मेदारी बइगा के होथे।
देवी-देवता के पूजा करे के परंपरा
छत्तीसगढ़ के लोक संस्करीति म लछमी पूजा के दिन ल 'सुरहोतीÓ कहिथें। 'सुरÓ के मायने हे देवता अउ 'होतीÓ के मतलब होथे पूजा। सुरहोती के दिन लोक देवता मन के संगे-संग सबो परकार के देवी-देवता मन के पूजा करे के परंपरा हे। गाय अउ बइला किसान के अंग माने जाथे। गोधन ल लछमी मानथें।
उछाह अउ सौहार्द भाव से मनाथें
गौरी-गौरा गोड़ जनजाति के परब आय। फेर, जम्मो गांव ऐला उछाह अउ सौहार्द भाव से मनाथें। गांव वालेमन दीया बारे बर तेल दान करथें। दीया बारे ले अंधियार मिटा जथे। चारोमुंडा अंजोर छा जथे। बइगा के घर ले गौरी-गौरा ल साज-संवार के निकालथें। ऐला आसन डोलाना कहिथें। बाजा-गाजा के संग परघनी सुरू होथे। ईसर राजा दूल्हा हे।गौर रानी दुलहिन बने हे। गांव वालेमन राजा-रानी के सुवागत करथें। माइलोगिनमन गाथें-
'भइया से केहेवे-भइया बढ़ई
हमर ईसर ला दे।
बिहनिया बाजा-गाजा के संग होथे बिसरजन
भावावेस म पुरुस अउ माइलोगिनमन झूमे लगथें। बइगा ह वोमन ल हूम-जग देके सांत कराथे। गौरा ल सुताय बर घलो गीत गाथें।
सुतव गौरी, सुतव गौरी,
सुतव सहर के लोग।
बिहनिया बाजा-गाजा के संग गौरी-गौरा ल तरिया म बिसरजन करे बर लेगथें।
'ढेला ढेलौनी जौहर सेनी,
ढेला ला मारे तुसार।
ईसर राजा कातिक नहाये,
धोतियां ला मारे तुसार।Ó
कुवांरी माटी ल बइगा के घर अमराथें। बइगा घर गौरी-गौरा के मूरति बनथे। मूरति बनाय ले लेके, गौरा चौरा म बिराजित करे के जम्मो जिम्मेदारी बइगा के होथे। गौरी-गौरा गोड़ जनजाति के परब आय। फेर, जम्मो गांव ऐला उछाह अउ सौहार्द भाव से मनाथें। गांव वालेमन दीया बारे बर तेल दान करथें। दीया बारे ले अंधियार मेटा जथे। चारोमुंडा अंजोर छा जथे। गौरी-गौरा ल साज-संवार के बइगा के घर ले निकालथें।