
मरिया भात के का जरूरत?
रात के 11 बजत रहय। फेर, बुधरु के आंखी म नींद गंवा गे रहय। बुधरु के आंसू भरे आंखी म वोकर एकेझन बेटा के फोटो ह झिलमिलात रहय। जेहा एक हफ्ता पहिली भगवान घर चल दे रिहिस। उही बेरा म कोनो मनखे ह बुधरु ल चिल्लइस। खोलिस त वो मनखे ह कहिथे- चल, तोला समाज के बइठका म बलाय हे।
बइठका म समाज के सियान कहिथे- कइसे बुधरु, तोर बेटा के मरिया भात नइ खवाय हस? बुधरु कहिथे- आप सबोमन तो जानत हव, मोर घर के का हालत हे। मोर कर अतीक ताकत नइये के मेहा समाज ल मरिया भात खवा सकंव। सियानमन तभो ले बुधरु के ऊपर दबाव बनाइस। समाज ले छोड़ देबो के धमकी देथें। घर आके अपन सुवारी (घरवाली) ल बताथे।
वोकर सुवारी कहिथे- का इही समाज हरे, जेहा एक-दूसर के दुख-सुख ल घलो नइ समझंय। अइसे कहत वोहा सिसक-सिसक के रोये लगिस। बिहान दिन बुधरु ह घर म रखे कुछु नानमून गहना अउ 35 डिसमिल जमीन ल बेच के मरिया भात खवाय के जुगात करथे।
Published on:
18 Nov 2020 04:13 pm
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