
देस के आत्मा गांव अउ अन्नदाता किसान के होवत हे दुरगति
मि तान! मनखे के सबले बडक़ा कमजोरी होथे वोकर बढ़ई। बस, बात के अंगाकर रोटी संग आधा सच अउ आधा लबारी के पताल के चटनी- आमा के अथान परोस के ऊपर से थोकन खुसामद के भुंजाय मिरचा दे दव। ये उपाय ल अपना के बाद आपमन बड़़ असानी से कोनो भी मनखे ल फुसला सकथव। आपमन देखे होहू आजकाल के कतकोन चलाक परेमीमन ये अब्बड़ जुन्ना बिधि (उपाय) ल सुन्दरीमन ल फुसलाय बर परयोग म लेवत रहिथें अउ हमर नेतामन तो ये तरीका ल भोली-भाली जनता, किसान, गांववालेमन ल पटाय म काम लावत रहिथें।
सिरतोन! हमर देस के आत्मा गांव ल कहिथें अउ गांव वालेमन ह बहुतेच सिधवा, भोला-भाला होबेच करथें। वोमन ककरो भरोसा कर लेथेंं। काबर के वोमन छलकपट नइ जानंय। तेकर सेती छपकपट करके ऐमन ल फुसला लेथें। धोखा दे देथें। ठग लेथें। लबारी मार के लूट लेथें।
मितान! आपमन कोनो गांववाले ल थोकन मुंह ल उतार के, थोथना ल नवा के, रोनहू सकल बना के, भावुक स्वर म कइहू के आपमन मोर आत्मा अव। बस, फेर देखहू। आत्मा सब्द सुनके मनखे तुरते जन्म के सगा-संबंधी बरोबर हो जथे अउ अइसन भावुक, सिधवा मनखे ल तुरते फुसलाय बहकाय जा सकथे।
सिरतोन! हमर बबा काहय के भावुकता म कोकरो से वादा नइ करे बर चाही अउ गुस्सा म ककरो से वादा नइ तोड़े बर चाही। हमर नेतामन अजादी के बाद से सरलग कहत रिहिन के भारत के आत्मा गांवमन म बसथे या फेर भारत ह खेती-किसानी के देस ए या सच्चा भारत गांवेचमन म मिलथे। ये सब बात ह सिधवा, भोले-भाला गांववालेमन ल भावुक बना देथे। अउ दूसर कोती हमर नेतामन नीति-नियम अउ बजट बनाय के समे सबले जादा गांव-गंवई डहर ले आंखी मूंद लेथें।
मितान! सब मानथें के भारत गांवमन के देस ए। हमूमन नानपन ले इही पढ़त-सुनत आवत हन। त फेर गांव अउ गांववालेमन के सबले जादा दुरगति काबर होवत हे? किसानमन ल बात-बात म खून के आंसू काबर रोय बर परथे? गांव ह देस के आत्मा हे त फेर आत्मा के दुरगति काबर होवत रिहिस हे? काबर देस के किसानमन ल धरना, परदसन करे बर परथे। काबर अन्नदातामन ल लउठी-गोली खाय बर परथे? आखिर किसानमन ल वोकरमन के मेहनत के वाबिज फल काबर नइ मिलय? अपन अन्न-फसल ल अपन दाम म काबर नइ बेच सकंय? आखिर किसानमन के अन्न-फसल के दाम सरकार अउ बेपारीमन काबर तय करथें। जबकि कंपनी, कारखाना मालिकमन अपन बनाय सामान ल अपन हिसाब से दाम तय करके बेचथें।
वाह! किसानमन ल सिधवा, कमजोर समझ के सबो वोकरमन ऊपर मनमानी करत हें। जब जेकर मेहनत से उजाय अन्न ल खाथें, वोकर ऊपर गुरराथें-गरजथें। आज देस म किसानमन ल लेके ‘उल्टा चोर कोतवाल ल डांटे’ के हालत हे। किसानमन ल सबो फुसलाय म लगे रहिथें, त अउ का-कहिबे।
Published on:
07 Dec 2020 04:57 pm
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