
छत्तीसगढ़ी म गोठियाव
छ त्तीसगढ़ म कई किसम के रंग देखे बर मिलथे। चाहे वोहा तीज-तिहार के रोटी-पीठा के रूप म, चाहे इहां के लोककला, गीत, संगीत, रहन-सहन, खान-पान अउ बोली, भाखा ले गुरतुर गोठ म। जब मेहा पढ़ई करत रहेंव त स्कूल, कॉलेज म मोर बोली झार छत्तीसगढ़ी रहय। कोनो जगा कोनो बेरा काकरो आघू रहय। अभी घलो हर जगा मोर पहिली भाखा रहिथे। ऐकर सेती मोला कईलोगन अतेक घलो कहि डारथें किए तेहा छत्तीसगढ़ी गोठियाय बर किरिया खा डारे हस का। अब आपे बतावव कि अपन महतारी भाखा ल बोले बतराय बर कोनो किरिया खाए ल लागथे का।
मोला एक झिन पढ़े-लिखे मनखे ह टोक देय रहिस। कइसे वो नोनी तंय ह अतेक पढ़-लिख के घलो हिंदी म काबर नइ बोलस। जभे सुनबे तब छत्तीसगढ़ी म पटर-पटर मारत रहिथस। मेहा वोला पलट के जवाब दे परेंव- कस गा तेहा छत्तीसगढिय़ा हस, धन परदेसिया। मोर भाखा के खिलाफ एक सब्द ऊंच-नीच नइ सुन सकंव। हमर मयारु भाखा म वो सहजता अउ सादगीपन के रस भरे हे। अपन महतारी भाखा ल गोठियाय बर कभुझन लजाव, भलुक कोनो जगा हो। अंतस के आरो ल निकालव। जउन ह अंतस ले गरब करथे, उही असली छत्तीसगढिय़ा के चिन्हारी हे। चाहे वोहा इंहे रहय या फेर बिदेस म। अपन चिन्हा ल कभु नइ लुकाय। छत्तीसगढ़ी ल अपन बोली म खचित बउरव अउ ये गुरतुर मीठ बानी के महमहासी ल ऐकर चिन्हा के रंग ल हर जगा बगरा के ऐकर मिठास ल नंदाय ले बचावव।
Published on:
08 Jun 2021 04:22 pm
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