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मेहनत के पूजा के परब ‘पोरा’

परब बिसेस

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मेहनत के पूजा के परब ‘पोरा’

मेहनत के पूजा के परब ‘पोरा’

छत्तीसगढ़ म पोरा याने छत्तीसगढ़ी भासा म पसुधन परेम अउ मेहनत के पूजा करके के परब ए। पोरा बोलबे त आंखी के आघू म नंदियाबइला दिखे लगथे। सच म बइला ह किसान ल ताकत देवइया ए। तभे तो कहिथें - ‘चल-चल मोर जांगर, खांध मा बोह ले नांगर।’
छत्तीसगढ़ म हर बछर भादो अमावस्या के दिन पोरा तिहार मनाथें। ए दिन बइलामन ल तरिया म लेके बढिय़ा धोथें। घर लाके सींग म तेल अउ पालिस लगाथें। घेंच म घुंघरू, घंटी या फेर कउड़ी के माला पहिनाथें। बइला के खुर म तेल-पालिस लगाके सजाय-संवारे के परंपरा हे। कुमकुम-गुलाल लगाके पूजा करथें, वोकर परति भगती-भावना परगट करथें।
चंद्रकुमार चंद्राकर के लिखे सब्दकोस म पोरा के मायने माटी के बने चक्की बताय गे हे। फेर, पोरा के मायने व्यापक हे। पोरा के मतलब किसान के परब। नंदियाबइला अउ जांता-चुकिया। खेती-किसानी के काम म अवइया अउजार अउ घर-दुवार के काम-बुता म अवइया जिनिस घलो होथे। पोरा याने लोक जीवन के धरममूलक भावना।
‘भज ले रे तज अभियान, सिरी सीताराम ला सुमर भजो, बोथे सोना जागे नइ, गये समे बहुरै नइ, खोजय मिलै न उधार। गाड़ी हा अटके हवन रेती मा, बइला अटके घाट, जियरा अटके राम बिना, कइसे उतरंव पार।
भजन म कहे हावय के, मान-अभिमान छोडक़े सीताराम के सुमिरन करव। सोना ह बोय ले नइ उगय। मोती ह रूख के डार म नइ फरय। बीते समे लउट के नइ आवय। उधार कोनो जिनिस मिलत नइ। जिनगी के गाड़ी रेती म अटक गे हे अउ वोमा फंदाय बइला घलो घाट म अटक गे हे। परान राम के बिना अटके हे- तब मेहा पार कइसे उतरहूं।
लोगनमन मानथें के, बइला ह किसान के हरेक काम करथे। पोरा के दिन बइलामन के पूजा करके मेहनत के महत्तम ल बताय जाथे। पूरा दिन बइलामन ल आराम देथें। सजा-संवार के सांझकुन बइला दउड़ के आयोजन करे जाथे। किसान माटी के कोरा म पले-बढ़े होथे। माटी ह वोकर जिनगी होथे अउ बइला वोकर परान होथे। तेकरे सेती घर के लइकामन ल माटी के बने पोरा-जांता अउ नंदियाबइला बांटे जाथे। पुरुस कमा के लाथे अउ माइलोगिन घर के काम-बुता करथें। तेकरे बर घर के टूरा लइकामन ल नंदियाबइला अउ टूरी मन ल पोरा-जांता खेले बर देथें।