
राउत नाच अउ दोहा
राउत नाचा ह छत्तीसगढ़ के संस्करीतिक कला के पहिचान बन गे हे। छत्तीसगढ़ म यदुवंसी (राउत, अहीर, रावत, ग्वाला, गोपाल) मन ल बीर-बहादुर अउ जुझारू मनखे माने जाथे। गांव-गंवई ले सहर म हर बछर राउत बजार अउ मड़ई-मेला लगथे। राउत नाचा कब ले सुरू होइस, ए बताना कठिन हे। फेर, भगवान किरिस्न के समे म दुवापर जुग ले ए सल्लगहा परम्परा ह चलत आवत हे। जब गंड़वा बाजा के संग नचकरहा ह गीत गाथे अउ यादवमन बीच-बीच म परिवार, समाज अउ देस सुधारे बर जोस-खरोस के संग ‘दोहा’ पारथे त रूंआ-रूंआ खड़ा हो जाथे।
सदा भवानी दाहिनी, सन्मुख रहे गनेस हो, पांच देव मिलि रक्छा करंय, बरम्हा, बिसनु, महेस हो।
एही जनम अउ वोहू जनम, फेर-जनम-जनम अहीर हो, चिखला कांटा मं माड़ी गड़े, दूध मं भींजे सरीर हो।
राउत-राउत का कइथव संगी, राउत गाय चरइया रे, दुरपति के लाज रखइया, बंसीवाला कन्हइया रे।
बइरी सन्मुख देख के काबर जी डराय हो, परान हथेली म राउत के, छाती रहय अड़ाय हो।
नारी के झन निंदा कर भइया, नारी नर के खान रे, नारी नर उपजावय भइया, धुरूव-परहलाद रे।
सुमिरन कर ले दाई-ददा के, गुरु के चरन मनावेंव हो, चउंसठ जोगिनी पुरखा के, जिनगी पार लगाए हो।
कनवा होगे कानून ह संगी, भइरा होगे सरकार हो।
Published on:
01 Nov 2021 05:01 pm
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