
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी इंतजार में नगर सैनिक (photo source- Patrika)
विनोद जैन/Chhattisgarh Home Guard: गोबरा नवापारा। छत्तीसगढ़ के हजारों नगर सैनिक (होमगार्ड) आज भी अपने वैधानिक अधिकारों और सेवा सुविधाओं की आस लगाए बैठे हैं। जबकि इस मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश देते हुए राहत देने का रास्ता साफ कर दिया था। इसके बावजूद आदेश के क्रियान्वयन में हो रही देरी अब कई सवाल खड़े कर रही है।
नगर सैनिकों की सेवा सुविधाओं और अधिकारों से जुड़े मामले में लंबे समय से कानूनी लड़ाई चल रही थी। इस मामले में 13 फरवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया था। इसके साथ ही उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए राज्य शासन को तीन माह के भीतर आदेश का पालन करने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नगर सैनिकों में उम्मीद जगी थी कि वर्षों से लंबित मांगों और सेवा संबंधी सुविधाओं को लेकर सरकार जल्द निर्णय लेगी। लेकिन तय समयसीमा समाप्त होने के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।
मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया है कि गृह विभाग ने 12 मार्च 2026 को जारी अपने आधिकारिक पत्र में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लेख किया था। पत्र के अनुसार शासन ने नगर सैनिकों की सेवा शर्तों और सुविधाओं में आवश्यक संशोधन के लिए विधिक राय भी मांगी थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार को न्यायालय के आदेश की पूरी जानकारी थी और प्रक्रिया शुरू करने के संकेत भी मिले थे। बावजूद इसके अब तक आदेश के पालन को लेकर कोई अंतिम निर्णय या अधिसूचना जारी नहीं की गई है।
नगर सैनिकों का कहना है कि उन्होंने अपने अधिकारों के लिए वर्षों तक न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद जब फैसला उनके पक्ष में आया, तब उन्हें उम्मीद थी कि अब शासन शीघ्र कार्रवाई करेगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी लाभ नहीं मिलने से नगर सैनिकों में निराशा बढ़ रही है। उनका कहना है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद उन्हें राहत नहीं मिलती, तो न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब राज्य सरकार की एसएलपी खारिज हो चुकी है और आदेश के पालन के लिए निर्धारित तीन माह की अवधि भी समाप्त हो चुकी है, तो फिर क्रियान्वयन में देरी क्यों हो रही है? कानूनी और प्रशासनिक हलकों में भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद आदेश लागू न होने की स्थिति में जवाबदेही किसकी तय होगी। क्या संबंधित विभागों से स्पष्टीकरण लिया जाएगा या फिर नगर सैनिकों को अपने अधिकारों के लिए एक बार फिर न्यायालय की शरण लेनी पड़ेगी?
प्रदेशभर में कार्यरत हजारों नगर सैनिक और उनके परिवार अब राज्य सरकार के अगले कदम का इंतजार कर रहे हैं। उनका मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब किसी तरह की कानूनी बाधा शेष नहीं है, इसलिए शासन को जल्द से जल्द आदेश लागू कर नगर सैनिकों को उनका अधिकार देना चाहिए।
Published on:
18 Jun 2026 05:25 pm
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