
Supreme Court (file photo)
Chhattisgarh News: नगर पालिक निगम दुर्ग के कर्मचारी राजूलाल चंद्राकर ने अपने अधिकार और न्याय की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दी है। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल और छत्तीसगढ़ शासन को नोटिस जारी किया है। कर्मचारी ने आरोप लगाया है कि पदोन्नति मिलने के बाद जब उन्होंने पदोन्नत पद का वेतन मांगा तो उनकी पदोन्नति ही निरस्त कर दी गई। राजूलाल चंद्राकर को छह अक्टूबर 2023 को जलकार्य निरीक्षक पद पर पदोन्नति दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट में निगम आयुक्त की ओर से दायर शपथ पत्र में कहा गया कि सेवा शर्तों के अनुसार चंद्राकर को पदोन्नत किया गया है और वे उसी पद पर कार्यरत हैं।
चंद्राकर का कहना है कि पदोन्नत पद का वेतन नहीं मिलने पर उन्होंने पांच बार आवेदन दिया, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने 16 जुलाई 2025 को बिलासपुर हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। आरोप है कि हाईकोर्ट में याचिका लगते ही 18 जुलाई 2025 को निगम प्रशासन ने उनकी पदोन्नति निरस्त कर दी। चंद्राकर का दावा है कि राज्य शासन के किसी आदेश में पदोन्नति निरस्त करने का उल्लेख नहीं है।
कर्मचारी के अनुसार कई जूनियर कर्मचारियों को नियमों के विरुद्ध नियमितीकरण और पदोन्नति का लाभ दिया गया। मामले में हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद चंद्राकर ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी क्रमांक 22932/2024 दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए शासन और निगम आयुक्त को नोटिस जारी किया है।
आयुक्त सुमीत अग्रवाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट से याचिका कॉपी (नोटिस) प्राप्त हुई है। राजूलाल चंद्राकर को जलकार्य निरीक्षक के पद पर पदोन्नति दी गई थी शासन से एवं ऑडिट से पुष्टि नहीं होने के कारण पदोन्नति निरस्त किया गया। वर्तमान में वे पंप अटेंडेंट के पद पर कार्यरत हैं।
नगर निगम भिलाई में आयुक्त को हटाने के मुद्दे पर अब मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। महापौर नीरज पाल, एमआईसी सदस्यों और कांग्रेस के सभी 32 पार्षदों ने संयुक्त रूप से उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर निगम आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नगर निगम अधिनियम 1956 की धारा 54(2) के तहत पारित प्रस्ताव को जानबूझकर शासन तक नहीं भेजा गया।
महापौर ने बताया कि 25 मार्च को आयोजित निगम की सामान्य सभा में दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए थे। पहला प्रस्ताव निगम आयुक्त को तत्काल पद से हटाने और दूसरा बजट पारित करने से संबंधित था। आरोप है कि आयुक्त ने बजट प्रस्ताव शासन को भेज दिया, लेकिन अपने खिलाफ पारित प्रस्ताव को रोक लिया। इसके बाद महापौर, एमआईसी सदस्यों और पार्षदों ने कलेक्टर, मुख्य सचिव और नगरीय प्रशासन विभाग को शिकायत भेजी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
याचिका में कहा गया है कि प्रस्ताव पारित होने के बाद भी आयुक्त पद पर बने हुए हैं और निगम के प्रशासनिक एवं वित्तीय कार्य कर रहे हैं। पार्षदों का दावा है कि उन्हें सरकारी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने तक का अधिकार नहीं रह गया है।
Updated on:
14 May 2026 05:45 pm
Published on:
14 May 2026 05:42 pm
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