
एक पहर रात बीत गे रहिस। मेहा परछी म खड़े रहेंव। आगू महंत तरिया हा सुते ***** दिखत रहिस। एकझन माइलोगन ह तरिया पार म बइठे दिखिस। तरिया के थोरिक दूरिहा म सड़क उपर एकझन मंगइया ह काहत राहय- राम अउ रहीम बर दे दव ददा हो। भगवान के नांव म देब, ददा हो। ये अंधरा उपर दया करव माई-बाप।
सड़क म मोटर अउ सवारीमन के रेम बंद ***** होगे रहिस। एक्का-दुक्का मनखे दिख परंय। पहली तो मंगइया के अवाज ह कमती ***** लागय, फेर अब गुंजे लागिस। अचानक वो बाई ह उठिस अउ ऐती-ओती देख के मंगइया के हाथ म कांही दे दीस अउ धीरेकुन एक कोती रेंग दिस। मंगइया के हाथ म कागज के टुकड़ा दिखिस। जेला वोहा घेरी-बेरी रमजत रहिस। वो बाई ह का कागज दे हे?
ऐहा का बिसकुट ए। ऐला जाने बर मेहा आयेंव अउ मंगइया के तीर म जाके खड़ा होगेंव।
मोर आरो पाके मंगइया ह वो कागज के पुरजा ल दू अंगरी म दबा के मोला देखाइस अउ पूछिस- बबा, देख तो ऐहा का जिनिस ए?
मेहा देखेंव, दस रुपिया के नोट रहिस। कहेंव- दस रुपिया के नोट ल तंय कहां ले पायेस?
मंगइया ह नोट ल अपन झोरी म धरलीस अउ कहिस- कोनो भगवान के भक्तिन ह दे हे।
मेहा अउ कुछू नइ कहेंव- वो माइलोगन कोती दउड़ेंव, जउन ह अंधियार म एक सपना ***** लागत राहय। वोहा कइठिन गली म होत एकठन टूटे-फूटे, गिरे-परे घर के आगू म ठाड़ होइस। तारा खोलिस अउ भीतर चल दीस।
रातकन कांही पूछई ह बने नोहय सोच के मेहा लहूट गेंव। रातभर मोर जीव उही डहर जाय। एकदम बड़े फजर मेहा फेर उही गली म गेंव। जानबा होइस के वोहा रांडी अनाथिन आय।
मेहा दरवाजा म जाके हूंत करायेंव- 'देबीÓ मेहा तोर दरसन करे बर चाहत हंव। माइलोगन बाहिर निकल के दरवाजा म आ गीस... गरीबी अउ मजबूरी के जियत मूरति।
मेहा अटकती कहेंव- रातकन आपमन मंगइगा ला...।
देबी ह बात ल काटत कहिस- वोमा का बात हे। मोला वो नोट ह परे मिल गे रहिस हे। मोर बर का काम आतिस?
मेहा वो देबी के चरन म मुंड़ ल नवां देंव।
द्य लेखक : परदेशी राम वर्मा,
आमदी नगर, हुडको, भिलाई
Published on:
23 Mar 2018 07:21 pm
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