4 अप्रैल 2026,

शनिवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

क्लबफुट: अब 10 दिनों में ठीक होंगे बच्चों के टूटे पैर, रिसर्च के बाद नई तकनीक ईजाद

क्लबफुट : बच्चे बार-बार कर देते थे प्लास्टर गीला, ठीक होने में लगता था लंबा वक्त, रिसर्च के बाद अब 10 दिनों में ठीक कर रहे पैर.- आंबेडकर अस्पताल में किया गया रिसर्च, अब तक 20 बच्चों के ठीक किए गए पैर

3 min read
Google source verification
clubfoot.jpg

रायपुर। डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल क्लबफुट से पीड़ित बच्चों के लिए वरदान साबित हो रहा है। अब यहां दो से तीन माह नहीं सिर्फ 8 से 10 दिनों में ही बच्चों के टेढ़े-मेढ़े पैर ठीक किए जा रहे हैं। इसे लेकर हड्डी रोग विभाग के एचओडी डॉ. विनित जैन के मार्गदर्शन में डॉक्टरों व पीजी स्टूडेंट्स की टीम ने एक रिसर्च किया। इसमें बच्चों के जन्मजात पैरों के टेढ़ेपन (क्लब फुट) की बीमारी के इलाज की नई पद्धति ईजाद करते हुए 20 बच्चों के 36 पैर नई पद्धति से ठीक किए हैं।

अस्थि रोग विशेषज्ञ डाॅ. प्रणय श्रीवास्तव ने बताया कि बच्चों में क्लब फुट बीमारी की समस्या को देखते हुए साल 2019 में शोध शुरू किया गया था। सुपर एक्सेलरेटेड पोंसेटी पद्धति के तहत जन्म के तुरंत बाद बच्चों की जांच कर इलाज शुरू किया गया। पहले बच्चों के हफ्ते-हफ्ते में प्लास्टर लगाए जाते थे। नई पद्धति के तहत जन्म के तुरंत बाद विकृति पाई जाने पर बच्चे को भर्ती कर लिया जाता है। पहले दिन ही उसके पैर में प्लास्टर लगा दिया जाता है। यह प्लास्टर तीन दिनों तक रहता है। चौथे दिन से रोजाना प्लास्टर बदला जाता है। ऐसे में 7 से 10 दिन के इलाज में बच्चे का पैर ठीक हो जाता है। दसवें दिन एक छोटा सा ऑपरेशन करके एक पट्टा लगाया जाता है। यह सर्जरी दो से तीन महीने के इलाज में भी करनी पड़ती थी।

दूर-दूर से आने वाले परिजनों को इलाज कराने में होती थी दिक्कत, ऐसे में आया रिसर्च का विचार
डॉ. श्रीवास्तव बताते हैं कि अभी रिसर्च मोड पर ही काम हो रहा है। इस पद्धति से इलाज सिर्फ आंबेडकर अस्पताल में ही हो रहा है। इसका विचार दूर-दूर से आने वाले परिजनों की परेशानी को देखते हुए आया। जन्मजात क्लबफुट की समस्या से जूझ रहे बच्चों का पहले एक-एक हफ्ते में प्लास्टर लगाकर सीधा किया जाता था। इसमें 6 से 10 हफ्ते लग जाते थे। इसमें सबसे बड़ी दिक्कत उनको होती थी जो अंबिकापुर-जगदलपुर जैसे दूर-दूर के क्षेत्र से आते थे। ऐसे बच्चों का प्लास्टर लगाकर उन्हें घर भेज दिया गया। हफ्ते-हफ्ते उन्हें आना पड़ता था। इस बीच अगर बच्चा प्लास्टर गीला कर देता, तो उसके अंदर घाव हो जाता या प्लास्टर निकल जाता था। ऐसे में इलाज के बाद भी बच्चों को लाभ नहीं मिल पा रहा था।

15 बच्चों में किया गया रिसर्च
नई पद्धति से क्लबफुट की बीमारी का इलाज करने के लिए 15 बच्चों में रिसर्च किया गया। इन बच्चों के 26 पैरों को नई पद्धति से ठीक किया गया। इसके बाद 5 बच्चों के 10 पैर में इस पद्धति से इलाज किया गया। अब तक 36 पैर नई पद्धति से सौ फीसदी ठीक किए जा चुके है। डॉक्टरों का कहना है कि एक साल से कम उम्र के बच्चों का इस पद्धति से 10 दिनों में इलाज किया जा सकता है।

क्या है क्लब फुट की बीमारी
शारीरिक असामाताओं के कारण आमतौर पर जन्म (जन्मजात) के बाद पैरों का अंदर या बाहर की ओर मुड़ा होना या मांसपेशियों को हड्डी से जोड़ने वाले उतक सामान्य से कम होने के कारण पैर का लचीला होना क्लब फुट (मुद्गरपाद) कहलाता है। यदि प्रारंभिक अवस्था में इस विकृति का उपचार नहीं किया जाता है तो यह विकृति आजीवन विकलांगता का कारण बन सकती है। बच्चों में क्लबफुट की बीमारी क्यों होती है, इसका मजबूत कारण आज तक नहीं मिल पाया है, लेकिन गर्भ में पानी कम होना, जगह कम मिलने से यह समस्या आती है।

प्रदेश में क्लबफुट की स्थिति
वर्ष - बच्चे
2019-20 - 328
2020-21 - कोविड
2021-22 - 144
14 नवंबर 2022 तक - 148


क्लबफुट की बीमारी जन्म से बच्चों में हो जाती है। बच्चे जब बेहोश व सुन्न करने की स्थिति में आते हैं, तब इनका ट्रीटमेंट होता है। इसके बाद फिजियोथेरेपी महत्वपूर्ण होती है। ऑपरेशन के बाद फिजियोथेरेपी बहुत जरूरी होती है। ऐसा नहीं करने पर फिर से पैर टेड़ा हो जाता है।
- डॉ. सुभाष मिश्रा, प्रवक्ता स्वास्थ्य विभाग