
दीपोत्सव : दीए बेचने वाले कुम्हारों का जीवन अंधेरे में, उजियारे का इंतजार
दीपावली पर्व पर सभी लोगों के घरों को दीये से रोशन करने वाले कुम्हार आज भी समस्याओं से जकड़े हुए हैं। मिट्टी के दीये, कलश आदि सामान बनाने में उपयोगी मिट्टी, रंग, लकड़ी सहित अन्य वस्तुओं के दाम साल-दर-साल बढ़ रहे हैं। लेकिन मेहनताना में कोई वृद्धि नहीं होता। इसलिए आज भी अधिकांश कुम्हारों की आर्थिक स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ है। माटी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार वर्षो से उपेक्षित हैं, जबकि उनका पूरा जीवन माटी पर आश्रित है।
नदीपारा में कुम्हारों की लगभग 60-70 परिवार
ग्राम पंचायत मैनपुर के आश्रित ग्राम नदीपारा में कुम्हार परिवार वर्षो से निवास करते हैं। इस ग्राम की 75 प्रतिशत आबादी इनकी है। यह ग्राम मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है, नदी के बाढ़ से इन्हें भारी नुकसान हर वर्ष बारिश के दिनों में उठानी पड़ती है। कुम्हारों ने बताया कि त्यौहार को छोड़ अन्य दिनों मे उन्हें उनकी माटी पर की गई मेहनत का कोई संतोषजनक मोल नहीं मिलता। उनकी जीविका का साधन मिट्टी का बर्तन बनाना है और वे इसी से परिवार का जीविकोपार्जन करते हैं। नदीपारा में कुम्हारों की लगभग 60-70 परिवार निवास करते है। वे महंगाई से जूझ रहे है। हर वर्ष रंगों की कीमत बढ़ती जा रही है। मिट्टी के बर्तन बनाने व इस त्यौहारी सीजन मे पोरा, चुकी, दीया, नदिया बैल व मूर्ति बनाने में उन्हें महंगे रंगों का उपयोग करना पड़ता है। इन्हे पकाने के लिए लकड़ी भी खरीदना पड़ता है। लकड़ी की कीमत भी बढ़ गई है, जिसके कारण उन्हें पर्याप्त मुनाफा नहीं मिलता है।
बच्चों का भविष्य अंधकार में
उन्होंने आगे बताया कि शासन ने कुम्हारों को इलेक्ट्रानिक चाक व अन्य सुविधा उपलब्ध कराने की बात कही थी। कुम्हार पिछड़े वर्ग में आते हैं। शासन को उनकी कला को प्रोत्साहित करने के लिए सुविधा व मदद देने चाहिए। नदीपारा के कुम्हार उदेराम, उकिया बाई, टंकधर पांड़े, बेनूराम, उमाशंकर, पारेश्वर, निर्मला, बलराम ने बताया कि शासन द्वारा उन्हें किसी भी प्रकार की उनके कला कौशल मिट्टी के बर्तन मूर्ति बनाने के लिए सहयोग व अनुदान नहीं दिया जाता है, जबकि यदि इन्हें अनुदान के साथ अन्य कलाकारों को जो शासन प्रोत्साहन देता है ऐसा प्रोत्साहन मिले तो निश्चित रूप से यह समाज विकास की मुख्य धारा में तेजी से विकास करेगी।
कुम्हार उदेराम पांड़े ने बताया कि प्रदेश के कुम्हारों को वर्ष 2006 में हुए प्रदेश स्तरीय अधिवेशन में मिट्टी के लिए प्रत्येक गांव में 5-5 एकड़ जमीन देने की घोषणा तत्कालीन सरकार द्वारा की गई है। इस घोषणा को अबतक अमल में नहीं लाया जा सका है। रामा चक्रधारी ने बताया कि मिट्टी के कच्चे बर्तन को पकाने के लिए पर्याप्त मात्रा में लकड़ी व भूसा नहीं मिलने के कारण लोग इस व्यवसाय से किनारा कर रहे हैं। व्यवसाय तो चौपट हो ही रहा है साथ ही बच्चों का भविष्य अंधकार में जा रहा है।
Published on:
08 Nov 2023 06:05 pm

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