
डीओपीटी ने फर्जी आदिवासी अधिकारियों और कर्मचारियों को बचाने वाला आदेश लिया वापस
रायपुर. केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने हल्बी-कोष्टी जनजाति के फर्जी प्रमाणपत्र पर नौकरी कर रहे अधिकारियों-कर्मचारियों को बचाने वाला आदेश वापस ले लिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने फरवरी 2020 में डीओपीटी के इस आदेश को गलत बताते हुए सुधार का अवसर दिया था। छत्तीसगढ़ में भी सामान्य प्रशासन विभाग ने इसी साल 3 जून को ऐसा ही आदेश निकालकर 2000 से पहले नियुक्ति पा चुके ऐसे कर्मचारियों को राहत दी है।
डीओपीटी के इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने वाले नेशनल एकेडमी आफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (नालसर) हैदराबाद के पूर्व रिसर्च कल्संटेंट बीके मनीष बताते हैं, कोष्टी जाति के हजारों लोगों ने हल्बा-कोष्टा व हल्बी-कोष्टी के नाम से जनजाति का प्रमाण पत्र ले लिया है। ये लोग आदिवासियों के लिए आरक्षित पदों पर काबिज हैं।
अक्टूबर 2018 में उच्चतम न्यायालय की दो-जजों की एक पीठ ने गजानन निमजे और एसजी बारापत्रे मुकद्दमों में रिज़र्व बैंक और फ़ूड कार्पोरेशन के लगभग तीन सौ कोष्टी कर्मचारियों को सीमित राहत दे दी। तर्क था, उनके पास जाति सत्यापन के लिए पुराने कागज़ात नहीं थे। न्यायमूर्ति जोसेफ ने इन फैसलों में साफ किया था, वे सीमित राहत सिर्फ उन्हीं याचिकाकर्ताओं को दे रहे हैं जिनके नाम उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ के वर्ष 2012 के एक फैसले में दर्ज हैं और जिसपर विशेष अनुमति व पुनर्विचार याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं। डीओपीटी ने ऐसे लोगों की नौकरी सुरक्षित करने के लिए 8 अप्रैल 2019 को एक मेमोरेंडम जारी किया। इस ऑफि़स मेमोरेंडम में सीमित राहत देने वाले पैराग्राफ की पहली लाइन हटाकर यह दर्शाया गया, कोष्टी शासकीय सेवकों की नवंबर 2000 के पूर्व स्थायी की जा चुकी सभी की सभी नियुक्तियां सुरक्षित होगी। जबकि इस तारीख के बाद प्राप्त किए गए लाभ वापस करने होंगे।
फैसले के पैराग्राफ में अपीलार्थी शब्द के आगे डीओपीटी ने अपनी तरफ से कोष्ठक में लिख दिया-जो कि हल्बा/कोष्टि/हल्बा-कोष्टि वर्ग से आते हैं। मनीष ने कहा, उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में डीओपीटी के सचिव सी. चंद्रमौली के खिलाफ न्यायालय की अवमानना का मामला दायर किया। फरवरी 2020 में न्यायालय ने डीओपीटी को आफिस मेमरेंडम में सुधार का आदेश दिया। हलबा समाज के अध्यक्ष बीएस रावटे ने कहा, न्यायिक निर्णयों की जानकारी देने के बावजूद छत्तीसगढ़ में सामान्य प्रशासन विभाग ने ऐसा ही आदेश 3 जून को निकाल दिया। यहां भी जीएडी सचिव के खिलाफ समाज अदालत जाने की तैयारी में हैं।
हल्बा समाज ने खोला है मोर्चा
बीएस रावटे बताते हैं कोष्टी, पिछड़ा वर्ग में आने वाली एक जाति है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश के बालाघाट, सौंसर, छिंदवाड़ा में इनकी बड़ी संख्या है। राज्य निर्माण से पहले किसी ने छानबीन नहीं की और हजारों ऐसे लोग एसटी आरक्षित सीटों पर काबिज हो गए। जानकारी आने पर विरोध शुरू हुआ।
हजारों पर पड़ेगा प्रभाव
जाति प्रमाण पत्र छानबीन समिति ने अभी तक 580 कर्मचारियों के एसटी प्रमाण पत्र को फर्जी साबित किया है। रावटे कहते हैं, इसमें सर्वाधिक संख्या कोष्टी वर्ग के कर्मचारियों की है। जिलों से अभी भी शिकायतों का आना जारी है।
Published on:
02 Aug 2020 01:17 am
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