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चंद्रग्रहण का असर! सदर की 100 साल पुरानी परंपरा टूटी, होलिका दहन के साथ मनाया होली

Chandra Grahan 2026: चंद्रग्रहण के कारण दो दिन होलिका दहन हुआ है। वह रिवाज भी नहीं दिखा जब होलिका दहन के एक दिन पहले से रंग-गुलाल से सदरबाजार सराबोर होता था..

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Chandra Grahan 2026

सदर की 100 साल पुरानी परंपरा पर टूटी, होलिका दहन के साथ मनाया होली ( Photo - Patrika )

Chandra Grahan 2026: केपी शुक्ला. राजधानी के सदर की 100 साल पुरानी परंपरा पर 'ग्रहण' लग गया। इस बार तो होली के दौरान भद्रा और चंद्रग्रहण की वजह से दो दिन होलिका दहन हुआ। वह रिवाज भी नहीं दिखा जब होलिका दहन के एक दिन पहले से रंग-गुलाल से सदरबाजार सराबोर होता था। मंगलवार को यहां आवाजाही सामान्य रही, दुकानें खुली रहीं। शाम को होलिका दहन के साथ जश्न मनाया गया।

Chandra Grahan 2026: कई जगह सोमवार तो कई जगह मंगलवार को होलिका दहन

ऐसा पहली बार है, जब दो दिन होलिका दहन की स्थिति तिथियों और समयकाल की वजह से बनी। राजधानी में भी कई जगहों पर सोमवार तो कई जगहों पर मंगलवार को होलिका दहन हुआ। सदर की होली में रंगत और रिवाज की पहचान है, लेकिन आधुनिकता के कारण भी उसमें बड़ा बदलाव देखने को मिला। क्योंकि पहले जैसा न तो उल्लास का माहौल दिखा न ही ठंडई और पिचकारी बौछारों का नजारा।

सेठ नाथूराम की पूजा परंपरा ही पहले जैसी

सदरबाजार के महेंद्र कोचर बताते हैं कि सदर की होली उत्सव में बड़ा बदलाव आया है। परंतु सेठ नाथूराम की शोभायात्रा और उनकी पूजा-अर्चना के साथ उत्सव के समापन की परंपरा कायम है। फाल्गुन शुल्क पक्ष की एकादशी के दिन सदरबाजार के कारोबारी शिव अवतारी सेठ नाथूराम की बारात निकालते हैं। फिर होलिका दहन से सदर में रंगोत्सव की धूम मच जाती थी, परंतु इस बार तिथियों के कारण सिर्फ एक दिन ही लोग रंगों में सराबोर हुए।

ये परंपरा भी कहानी बन गई

कोचर यह भी बताते हैं कि होली का उत्सव नाट्य मंचन, फाग और रंग-गुलाल की धूम सेठ नाथूराम की पूजा-अर्चना के साथ रहती थी। परंतु अब यह एक कहानी हो गई। इसी तरह बड़ी-बड़ी पीतल की पिचकारी में रंग खेलने की स्पर्धा गिरधर भवन जगन्नाथ मंदिर के पास से शुरू होती थी। बुराई की प्रतीक होलिका दहन की लकड़ी का कोयला लेकर लोग घर लौटते थे, जिसे शुभ मानाते हुए माताएं और बहनें घर-घर लाप्सी बनाती थी, जिसे प्रसाद के रूप में खाते थे। तब सिगड़ी जला करती थी। परंतु गैस सिलेंडर के साथ ही यह परंपरा भी अब कहानी बन गई है।