
"पहली गोली दुश्मन की हो सकती है लेकिन दूसरी गोली आपकी होनी चाहिए" के मूलमंत्र के साथ ट्रेनिंग स्कूल के जवान ले रहे नक्सलियों से लोहा
रायपुर. छत्तीसगढ़ नक्सलवाद की समस्या से जूझ रहा है।सरकार इनसे निपटने के रोज नए प्रयास कर रही है और इस बार सरकार ने लोहे को लोहे से काटने की तरकीब आजमा रही है।नक्सलवाद से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए 2005 में छत्तीसगढ़ में तीन काउंटर टेररिज्म और जंगल वारफेयर ट्रेनिंग स्कूल खोले गए जहाँ जवानो को पैरामिलिट्री फ़ोर्स और पुलिस के अधिकारी जवानो को प्रशिक्षण देते हैं ।
"गुरिल्ला से गुरिल्ला की तरह पर लड़ो" यह काउंटर टेररिज्म और जंगल वारफेयर ट्रेनिंग स्कूल यानी CTJWC का आदर्श वाक्य है।
"पहली गोली दुश्मन की हो सकती है, लेकिन दूसरी गोली आपकी होनी चाहिए " यही वाक्य सीटीजेडब्ल्यूसी का मूल मन्त्र है जिसका प्रयोग वहां के प्रशिक्षकों द्वारा जवानो को प्रेरित करने के लिए किया जाता है।
इस कदम से माओवादियों द्वारा पुलिस बलों पर नियमित हमले किए गए, जिसके परिणामस्वरूप वर्दी में पुरुषों की भारी भीड़ और राज्य को लग रहा था कि एक दुर्बल और दुर्बल प्रशिक्षित पुलिस बल नक्सली समूहों को नहीं ले सकेगा, जो ताकत हासिल कर रहे थे छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, बिहार और पश्चिम बंगाल के बड़े हिस्से में।
कैसे होता है इनका प्रशिक्षण
यहाँ प्रशिक्षण में इस बात पर विशेष ध्यान देते हैं की प्रशिक्षण ले रहे जवान नक्सलियों के हमले करने के तौर तरीकों को ठीक से समझ सकें। नक्सली हमले का कोई तय स्थान नहीं होता वो गोरिल्ला तकनीक का इस्तेमाल करते हैं ऐसे में जवानो को जल्द से जल्द स्थिति से निपटने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार किया जाता है।
बस्तर में नक्सलियों के साथ ही जंगली जीव जंतुओं से कैसे निपटना है और विशेष परिस्थियों में उनका उपयोग कैसे करना है इसका भी उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता है। इस प्रशिक्षण में पुरुष के साथ साथ महिला जवान भी हिस्सा लेती हैं।
CTJWC में 45 दिन का प्रशिक्षण दिया जाता है जिसमें रोज 5 किलोमीटर और सप्ताह में एक दिन 30 किलोमीटर की दौड़ कराई जाती है इसके अतिरिक्त सप्ताह में एक दिन भारी बोझ के साथ 20 किलोमीटर की दौड़ भी कराई जाती है।45 दिन के इस प्रशिक्षण में 14 दिन उन्हें जंगल में गुजारने होते है ताकि वह जॅंगल और उसके वातावरण को ठीक ढंग से समझ सकें।पहाड़ों पर चढ़ने और ऊंचाई से कूदने का अभ्यास कर सकें।
इन हथियारों को चलाने का लेते है प्रशिक्षण
नक्सली दिन बी दिन आधुनिक होते जा रहे हैं और अब वो अत्याधुनिक हथियारों से लैस है इसीलिए जवानो को हर तरह के आधुनिक हथियारों को चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इंसास राइफल,एलएमजी,एसएलआर,ए के 47,यूबीजीएल,मोर्टार और हैंड ग्रेनेड को चलाने और ऐसे हथियारों से जुडी सभी जानकारियां जवानो को दी जाती है।
इतने जवान हो चुके है प्रशिक्षित
एक अप्रैल 2005 में शुरू हुए इस ट्रेनिंग स्कूल से अबतक 31 हजार से ज्यादा महिला और पुरुष जवान प्रशिक्षण ले चुके हैं और नक्सल प्रभावित इलाकों में काम कर रहे हैं।
देश में और कहाँ है ऐसे ट्रेनिंग स्कूल
भारत में मिजोरम के वेरिंटेज इलाके में भारतीय सेना ने पहले काउंटर टेररिज्म और जंगल वारफेयर ट्रेनिंग स्कूल की स्थापना की थी ताकि मिजोरम के उग्रवादियों से प्रभावी तरीके से निपटा जा सके।
कब और कैसे अस्तित्व में आया यह काउंटर टेररिज्म और जंगल वारफेयर ट्रेनिंग स्कूल "CTJWC"
1960 के दशक में मिजो उग्रवाद से निपटने के लिए आतंकवाद रोधी इकाई स्थापित करने की योजना बनी। फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ जो भारतीय सेना की पूर्वी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ थे उन्होंने ने ही पहली बार इसका प्रस्ताव सरकार को दिया था।CIJWS की स्थापना 1967 में जंगल ट्रेनिंग स्कूल के रूप में हुई थी जो मेघालय के जयंतिया हिल्स जिले में जोवल के पास, म्यानेरे में स्थित था।
1968 में इसे ईस्टर्न कमांड काउंटर इंसर्जेंसी ट्रेनिंग स्कूल में बदल दिया गया।1 मई 1970 को, इसे भारतीय सेना की ए श्रेणी के प्रशिक्षण संस्थान के रूप में अपग्रेड किया गया और इसका नाम इसका वर्तमान नाम काउंटर टेररिज्म और जंगल वारफेयर ट्रेनिंग स्कूल दिया गया था और उसके बाद इसे मिजोरम के वेंकांटे में स्थानांतरित कर दिया गया था। ब्रिगेडियर मैथ्यू थॉमसक को इस स्कूल का पहला कमांडेंट नियुक्त किया गया था ।
Updated on:
01 May 2019 12:51 pm
Published on:
30 Apr 2019 04:16 pm
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